रामकृष्ण मिशन आश्रम के वार्षिकोत्सव में गूंजा सेवा और शांति का संदेश

रांची: रामकृष्ण मिशन आश्रम के मोराबादी स्थित आश्रम में आयोजित वार्षिकोत्सव के दूसरे दिन रविवार को आध्यात्म, संस्कृति और सेवा भावना का अद्भुत संगम देखने को मिला। कार्यक्रम में युवाओं, बच्चों और श्रद्धालुओं की बड़ी भागीदारी रही। समारोह का मुख्य विषय “श्री सारदा देवी – कलियुग की सीता” रखा गया था। कार्यक्रम का आयोजन झारखंड सरकार के कला एवं संस्कृति निदेशालय के सहयोग से हुआ।
सुबह 9:30 बजे प्रथम सत्र की शुरुआत विवेकानंद फोरम, सारदा महिला समिति, गैप (GAP) एवं योग छात्र समूह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों से हुई। इस दौरान बच्चों ने शिक्षा, संस्कार और राष्ट्रभक्ति पर आधारित प्रस्तुतियों से सभी को भावविभोर कर दिया। गदाधर प्रकल्प, चिरौंधी के बच्चों ने बाल शिक्षा पर आधारित नाटक प्रस्तुत किया, वहीं गदाधर अभ्युदय प्रकल्प के बच्चों ने कविता पाठ, “हिंद देश के निवासी” समूहगान और हनुमान चालीसा का पाठ किया। कार्यक्रम में मेधावी बच्चों को सम्मानित भी किया गया।
मुख्य वक्ता स्वामी आत्मनिष्ठानंद ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि “बदलाव की शक्ति युवाओं में है। स्वामी विवेकानंद के आदर्शों को केवल पढ़ना नहीं, बल्कि जीवन में उतारना होगा।” उन्होंने गरीबों की सेवा को ईश्वर प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग बताते हुए “दरिद्र देवो भव” का संदेश दोहराया।
शाम 4:30 बजे आयोजित धर्मसभा में डॉ. निधि श्रीवास्तव ने कहा कि माँ सारदा, माता सीता की तरह करुणा और त्याग की प्रतिमूर्ति थीं। उन्होंने कहा, “एक बार दिल से पुकार लो — माँ है न, फिर किसी बात की चिंता नहीं।”
सभा की अध्यक्षता करते हुए स्वामी आत्मनिष्ठानंद ने माँ सारदा के जीवन से जुड़े प्रेरक प्रसंग सुनाए और कहा, “शांति चाहते हो तो अपना दोष देखो। संसार में सब अपना है, कोई पराया नहीं।” उन्होंने यह भी कहा कि स्वामी विवेकानंद भारतमाता को सीता का मूर्त स्वरूप मानते थे।
कार्यक्रम के अंत में निर्माणाधीन “दिव्य मंदिर” की प्रगति की जानकारी दी गई तथा छात्राओं ने “नव वेदांत का अग्रदूत” नाटक और “सबकी माँ सारदा” भजन प्रस्तुत किया। समारोह का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

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