लीची पर मंडराया ‘स्टिंक बग’ संकट, बचाव के लिए बनी वैज्ञानिकों की हाईटेक टास्क फोर्स
प्रदीप विद्रोही,भागलपुर। बिहार की शाही लीची पर एक नए कीट संकट का खतरा गहराने लगा है। राज्य में आक्रामक लीची स्टिंक बग टेस्साराटोमा जावानिका की मौजूदगी सामने आने के बाद वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों ने तुरंत मोर्चा संभाल लिया है। लीची उत्पादन, गुणवत्ता और निर्यात पर संभावित असर को देखते हुए आईसीएआर-राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) और राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की संयुक्त बहु-संस्थागत तकनीकी टास्क फोर्स गठित की गई है।
इस विशेष टास्क फोर्स का उद्देश्य लीची बागानों की व्यवस्थित निगरानी, जियो-रेफरेंस्ड मॉनिटरिंग तथा समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) रणनीतियों को विकसित कर समय रहते खतरे को नियंत्रित करना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो यह कीट लीची उत्पादन को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
फाइटोसैनिटरी उपायों पर जोर
विशेषज्ञों ने कहा कि लीची स्टिंक बग की मौजूदगी को देखते हुए पौध स्वास्थ्य सुरक्षा यानी फाइटोसैनिटरी उपायों को सख्ती से लागू करना बेहद जरूरी है। इसका उद्देश्य न केवल लीची बागानों को सुरक्षित रखना है, बल्कि कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को भी बचाना है ताकि खतरनाक कीटों, खरपतवारों और पौध रोगों का प्रसार रोका जा सके।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इस कीट की निगरानी और नियंत्रण के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप दिशा-निर्देश तैयार किए जा रहे हैं, जिससे बिहार की लीची की गुणवत्ता और निर्यात क्षमता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
भागलपुर के बागानों में चला विशेष सर्वे अभियान
बीएयू के निदेशक ए.के. सिंह और वैज्ञानिक किरण कुमारी के मार्गदर्शन में विशेषज्ञ टास्क फोर्स के सदस्य वैज्ञानिक गोस्वामी एवं अन्य सहयोगियों ने भागलपुर जिले के प्रमुख लीची उत्पादक क्षेत्रों में व्यापक फील्ड सर्वेक्षण और निगरानी अभियान चलाया।
यह अभियान बीएयू सबौर परिसर, कहलगांव, पन्नूचक, ममलखा, टिंटांगा, गंगानगर, बुधूचक और शांति कॉलोनी समेत कई महत्वपूर्ण लीची बागानों में संचालित किया गया।
सर्वेक्षण के दौरान बीएयू सबौर परिसर स्थित बागवानी उद्यान में लीची स्टिंक बग के निम्फ यानी प्रारंभिक अवस्था के कीट पाए गए। हालांकि राहत की बात यह रही कि अन्य सभी सर्वेक्षित बागानों में संक्रमण नहीं मिला। इससे वैज्ञानिकों को संकेत मिला है कि फिलहाल इसका प्रकोप सीमित दायरे में है और समय रहते नियंत्रण संभव है।
किसानों को सतर्क रहने की सलाह
बीएयू के कुलपति डी.आर. सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक और विशेषज्ञ राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों तथा राज्य बागवानी एजेंसियों के साथ समन्वय बनाकर लगातार स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक निगरानी, त्वरित निदान, किसानों में जागरूकता और समय पर आईपीएम उपायों को लागू करना बिहार के लीची उद्योग की सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने किसानों से अपील की कि वे अपने बागानों की नियमित निगरानी करें और किसी भी असामान्य कीट गतिविधि की सूचना तुरंत कृषि विशेषज्ञों को दें, ताकि समय रहते आवश्यक कार्रवाई की जा सके।
बिहार की लीची अर्थव्यवस्था के लिए अहम चुनौती
बिहार देश का प्रमुख लीची उत्पादक राज्य माना जाता है और भागलपुर सहित कई जिले लीची उत्पादन के बड़े केंद्र हैं। ऐसे में स्टिंक बग का खतरा केवल किसानों की फसल तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था और निर्यात बाजार भी प्रभावित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वैज्ञानिक रणनीति, सतर्क निगरानी और किसानों के सहयोग से सामूहिक प्रयास किए जाएं तो इस उभरते खतरे पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।



