यहां लेटा है एक बदनसीब बादशाह…

भागलपुर। बिहार का इतिहास सदियों से सांस्कृतिक, राजनीतिक और बौद्धिक विरासतों से समृद्ध रहा है। परंतु विडंबना यह है कि इसके कई महत्वपूर्ण अध्याय आज गुमनामी की धूल में दबे हुए हैं। अंग प्रदेश की धरती, जिसने अतीत की असंख्य गाथाओं को अपने कण-कण में संजोया है, आज स्वयं अपने इतिहास से बेखबर होती जा रही है। ऐसे ही एक भूले-बिसरे अध्याय का गवाह है कहलगांव ( भागलपुर ) के हटिया क्षेत्र में स्थित बंगाल के अंतिम स्वतंत्र सुल्तान महमूद शाह का मजार – एक ऐतिहासिक स्थल, जिसे अब न तो संरक्षण प्राप्त है और न ही सम्मान। इसके खंडहर चीख तो रही है परंतु इसकी चीख किसी को सुनाई नहीं पड रही है। यहां लेटा एक बदनसीब बादशाह की खोज खबर कोई नहीं लेता।

सुल्तान महमूद शाह का साम्राज्य एक समय बंगाल से लेकर बिहार के भागलपुर और मुंगेर तक फैला हुआ था। उसी दौर में अफगान शासक शेरशाह सूरी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को साकार करने के लिए सक्रिय था। महमूद शाह और शेरशाह के बीच हुए लंबे संघर्ष में अंततः महमूद शाह पराजित हुआ और उसने शरण लेने हेतु मुग़ल सम्राट हुमायूं की ओर रुख किया। हुमायूं ने सहायता हेतु कहलगांव की ओर कूच तो किया, परंतु इसके पूर्व ही शेरशाह के सेनापतियों ने बंगाल की राजधानी ‘गौर’ पर धावा बोल दिया और शहर को नष्ट कर दिया। इस आक्रमण में महमूद शाह के दोनों पुत्रों की भी क्रूर हत्या कर दी गई।

महमूद शाह जब अपने लाव-लश्कर के साथ बंगाल लौट रहा था, तभी रास्ते में उसे अपने पुत्रों की हत्या का दुखद समाचार मिला। इस आघात ने उसे मानसिक रूप से तोड़ दिया और 1539 ईस्वी में कहलगांव में ही उसका निधन हो गया। आज उसी स्थान पर उसका मजार स्थित है—मौन, उपेक्षित और विस्मृत; जैसे किसी लावारिस इतिहास का अंतिम निशान।

यह मजार न केवल एक पराजित शासक की अंतिम विश्रामस्थली है, बल्कि यह उस कालखंड का प्रतीक है, जब बिहार-बंगाल की भूमि पर सत्ता संघर्ष और राजनीतिक बदलाव की लहरें उफान पर थीं। महमूद शाह की पराजय और मृत्यु के बाद ही शेरशाह सूरी ने दिल्ली की गद्दी पर अधिकार जमाया, जिससे भारत में अफगान शासन का एक नया अध्याय शुरू हुआ।

इतिहास की इतनी महत्त्वपूर्ण कड़ी होने के बावजूद यह स्मारक आज उपेक्षा का शिकार है। पुरातत्व विभाग द्वारा इसे संरक्षित घोषित किए जाने के बावजूद मजार तक पहुंचने के लिए पक्का रास्ता नहीं है, न ही कोई संकेतक या सूचना पट्ट जो आगंतुकों को इसकी ऐतिहासिकता से परिचित करा सके। मजार की वर्तमान स्थिति बताती है कि हमारी ऐतिहासिक धरोहरें संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही हैं।

इतिहासकार एवं पूर्व जनसंपर्क उपनिदेशक श्री शिव शंकर सिंह ‘पारिजात’ कहते हैं, “धरोहरों, स्मारकों तथा पुरातात्त्विक महत्व के अवशेषों की उपेक्षा राज्य सरकार और संबंधित विभागों की वर्षों की उदासीनता का परिणाम है। समुचित रख-रखाव के अभाव में ऐसे स्थल अब आम लोगों की नजरों से ओझल होते जा रहे हैं।”

केवल महमूद शाह का मजार ही नहीं, कहलगांव स्थित ज्ञान का प्राचीन केंद्र विक्रमशिला महाविहार, सुलतानगंज की अजगैबी एवं व्यासकर्ण पहाड़ियां, शाहकुंड की खेरी पहाड़ी, पत्थरघट्टा की पहाड़ी पर उत्कीर्ण प्राचीन मूर्तियां और चंपानगर स्थित महाभारतकालीन कर्णगढ़ जैसे स्थल भी अपने पुनरुत्थान की बाट जोह रहे हैं।

समय आ गया है कि राज्य सरकार, पुरातत्व विभाग और स्थानीय प्रशासन इस ओर गंभीरता से ध्यान दें और इतिहास की इन मौन आवाज़ों को फिर से जीवंत करें। ताकि आने वाली पीढ़ियां न केवल अपने अतीत से जुड़ सकें, बल्कि उससे गर्व और प्रेरणा भी प्राप्त कर सकें।

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