गोपालपुर विधानसभा : एनडीए के अभेद्य किले पर महागठबंधन, जनसुराज और बागी गोपाल की नजर

भागलपुर: जिले की राजनीति में अगर किसी सीट को “हॉट सीट” कहा जाए, तो उसमें गोपालपुर विधानसभा का नाम शीर्ष पर आता है। पिछले चार चुनावों से यह सीट जदयू के खाते में सुरक्षित रही है, लेकिन इस बार सियासी हवा में कुछ अलग सरगर्मी महसूस की जा रही है। एनडीए के इस अभेद्य किले में सेंध लगाने की तैयारी में महागठबंधन, जनसुराज और बागी तीनों ही है। जदयू के भौकाली विधायक गोपाल मंडल का इस बार टिकट कट चुका है और वे निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में डटे हैं। दो दशक से गंगा और कोशी की त्रासदी झेलती गोपालपुर विधानसभा क्षेत्र की आबादी वोट के नाम पर ही बिदक उठती है। विस्थापन के दर्द से कराहती गोपालपुर की बड़ी आबादी आज भी एक अदद घर के लिए विलख रही है। कटाव का स्थायी निदान नहीं हो रहा है। करोड़ों पानी में बहाया जा चुका है।

महापर्व छठ के समापन के साथ ही गोपालपुर की राजनीति अपने उफान पर पहुंचने लगी है। अब तक जो माहौल शांत दिखाई दे रहा था, वह अब नारे, जनसभाओं और चौपालों की गूंज से भर गया है। हालांकि अब तक किसी दल के स्टार प्रचारकों का “उड़नखटोला” गोपालपुर की धरती पर नहीं उतरा है, जिससे प्रचार में वह जोश अभी पूरी तरह नहीं दिखा। वैसे, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सभा आज यानी तीन नवंबर को तीनटंगा (गोपालपुर) में तय है।

करीब 2.76 लाख मतदाताओं वाली यह विधानसभा सीट अपने इतिहास में कई दिलचस्प उतार-चढ़ाव देख चुकी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब 1952 में गोपालपुर, पीरपैंती विधानसभा का हिस्सा हुआ करता था, तब यहां के पहले विधायक बने थे स्व. सियाराम सिंह (कांग्रेस)। 1957 में गोपालपुर को अलग विधानसभा क्षेत्र का दर्जा मिला और यहां सीपीआई के कामरेड मणिराम सिंह ‘गुरुजी’ ने जीत दर्ज कर लाल झंडा फहराया। इसके बाद सत्ता कभी कांग्रेस, कभी कम्युनिस्टों और फिर भाजपा-राजद के बीच झूलती रही। मदन प्रसाद सिंह ने कांग्रेस के लिए लंबे समय तक इस क्षेत्र में पकड़ बनाए रखी। 1990 में पहली बार भाजपा ने इस क्षेत्र में दस्तक दी, जब ज्ञानेश्वर यादव ने जीत दर्ज की। 1995 से 2005 तक राजद के डॉ. आर.के. राणा और उनके पुत्र अमित राणा ने सत्ता संभाली। 2005 से लेकर अब तक जदयू के नरेंद्र कुमार नीरज उर्फ गोपाल मंडल का दबदबा रहा। उनके बेबाक और विवादित बयानों के बावजूद उन्होंने लगातार जीत हासिल की, जिससे गोपालपुर को “जदयू का दुर्ग” कहा जाने लगा।

इस बार का समीकरण बदला हुआ है। जदयू ने अपने मौजूदा विधायक नरेंद्र कुमार नीरज उर्फ गोपाल मंडल को टिकट से वंचित कर दिया है और मैदान में उतारा है पूर्व सांसद बुलो मंडल को। बागी हुए गोपाल मंडल अब निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में हैं, और यह बगावत जदयू के लिए सिरदर्द बनी हुई है। दूसरी ओर, महागठबंधन से प्रेम सागर उर्फ डबलू यादव (वीआईपी) और जनसुराज से मंकेश्वर सिंह उर्फ मंटू सिंह भी चुनावी रणभूमि में कूद पड़े हैं। दोनों ही गठबंधन जनता के बीच “बदलाव” और “नई राजनीति” के नारे के साथ उतर रहे हैं।

ग्रामीण इलाकों में सड़कों, रोजगार और शिक्षा को लेकर असंतोष की चर्चा है, जबकि गोपाल मंडल का “लोकल कनेक्शन” और बुलो मंडल का “अनुभव”-दोनों ही जनता को अपनी ओर खींचने की कोशिश में हैं। हालांकि बुलो मंडल अब तक सबके दिल में उतर नहीं पाए हैं। उन्हें भीतरघात का भय सता रहा है। वहीं, महागठबंधन और जनसुराज की टीमें बूथ स्तर तक रणनीति बनाने में जुटी हैं।

गोपालपुर का यह चुनाव महज एक सीट का नहीं, बल्कि कई राजनीतिक समीकरणों की परीक्षा है।

क्या गोपाल मंडल की बगावत एनडीए को भीतर से कमजोर करेगी।क्या महागठबंधन या जनसुराज इस ऐतिहासिक सीट पर नया इतिहास रच पाएंगे।यह सब तय करेगा 2.76 लाख मतदाताओं का फैसला, जो आने वाले दिनों में गोपालपुर की सियासी दिशा निर्धारित करेगा।

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