आंसुओं में डूबा नामांकन: बागी गोपाल मंडल ने निर्दलीय पर्चा भरा, जज्बाती हुए, नीतीश के लिए लगाए जयकारा!
प्रदीप विद्रोही,भागलपुर। राजनीति के अखाड़े में जहां आमतौर पर भाषण, नारों और वादों की गूंज होती है, वहीं शनिवार को जिले के गोपालपुर विधानसभा सीट पर कुछ और ही मंज़र देखने को मिला। जदयू के बागी विधायक गोपाल मंडल ने जब निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन किया, तो समर्थकों का हुजूम तो था, लेकिन चेहरे पर मुस्कान की जगह भावनाओं का सैलाब था। और बीच मंच पर सिसकते हुए, हाथ जोड़कर खड़े थे खुद गोपाल मंडल।
अगर मुझसे गलती हुई हो, तो माफ कर देना…
यह कहकर जैसे उन्होंने दिल जीत लिया।
भीड़ चुप थी, कैमरे फ्लैश कर रहे थे, और मंच पर खड़ा एक बागी नेता अपनी पार्टी, अपने नेता और अपने लोगों से माफी मांग रहा था। “मैंने कभी कोई गलती नहीं की, और ना करूंगा… लेकिन अगर आपसे कोई चूक हो गई हो, तो क्षमा चाहता हूं।”
इतना कहते ही उनके गालों पर आंसू ढलक पड़े।
लड़ाई ‘आर-पार’ की…
गोपाल मंडल ने इसे सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि इज़्ज़त की लड़ाई बताया। उन्होंने मंच से ललकारते हुए कहा “यह लड़ाई अब आर-पार की है। जो गोपालपुर की मिट्टी से जुड़ा है, वही गोपालपुर की लड़ाई लड़ेगा।”
“हम नहीं छोड़ेंगे नीतीश कुमार का साथ”
नामांकन भले ही निर्दलीय हो, पर गोपाल मंडल का दिल अब भी जदयू में ही धड़क रहा है। मंच से उन्होंने भावुक स्वर में जयकारा लगाया – “एक बार प्रेम से बोलिए, नीतीश कुमार की जय!” और समर्थकों ने भी दिल खोलकर साथ दिया।
‘बाहरी नहीं, गोपालपुर का बेटा चाहिए’
सभा में एक खास नारा भी गूंजा – “नहीं चाहिए बाहरी मंडल, गोपालपुर को चाहिए केवल गोपाल मंडल!” यह नारा साफ इशारा कर रहा था कि गोपाल मंडल के समर्थक शैलेश उर्फ बुलो मंडल को बाहरी मान रहे हैं, और मैदान में उनका विरोध तय है।
बगावत भी, वफादारी भी!
हालांकि गोपाल मंडल के तेवर बागी थे, पर उनके इरादे अब भी जदयू की तरफ झुके थे। “हम जीतकर यह सीट फिर से जदयू की झोली में डाल देंगे,”
यह बयान बहुत कुछ कह गया – गोपाल मंडल, टिकट कटने से आहत हैं, लेकिन पार्टी के लिए अब भी समर्पित हैं। शायद उन्हें नीतीश से उम्मीद है कि वापसी की कोई खिड़की अब भी खुली है। चुनाव 2025 की इस कहानी में राजनीति है, विद्रोह है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा इंसानी जज़्बात हैं।
नामांकन का ये दृश्य सिर्फ गोपालपुर की नहीं, बिहार की राजनीति की एक नई इबारत लिख रहा है। अब देखना है कि जनता इस इमोशनल अपील को आशीर्वाद में बदलती है या सियासत के दांव-पेच अपना रंग दिखाते हैं।



