नाथनगर: मतदाताओं का मिजाज आखिरी रात किसी को ‘अनाथ’ तो किसी को ‘भोलेनाथ’ बना देता

प्रदीप विद्रोही,भागलपुर। नाथनगर का सियासी थर्मामीटर इस वक्त उबलने की कगार पर है। मैदान में हैं तीन धुरंधर। एक ओर हैं आरजेडी के डॉ. जेड हसन, दूसरी तरफ हैं लोजपा (आर) के मिथुन यादव, वहीं जन सुराज से अजय राय। मिथुन की राजनीति पर लोग कहते हैं – वह तो मायावी है, भाई। सबको अपनी ओर खींच लेता है। यह करिश्मा लोगों ने जिला परिषद अध्यक्ष की कुर्सी हड़पने में देखा है। टिकट हथियाने में भी इसने कई अक्खड़ दावेदारों को चौंकाया। अब सवाल यह है कि नाथनगर में ‘मायावी’ मिथुन क्या ‘जेड’ श्रेणी की सुरक्षा को भेद पाएगा? दोनों ओर से घेराबंदी बेमिसाल है। वहीं जन सुराज के अजय राय इस आर-पार के संघर्ष को त्रिकोणीय बना चुके हैं। मतदाताओं की ‘राय’ भी अभी खामोश। यहां ‘माय’ दो ध्रुव में है। ‘एम’ आरजेडी तो ‘वाय’ लोजपा (आर)। यहां भी सेंधमारी। यहां समीकरण के भरोसे दोनों मुख्य चेहरे नहीं है। दोनों की नजर तीसरी, चौथी, पांचवीं… हवेली यानी वोट बैंक पर टिकी हुई है।

नाथनगर की रणभूमि में कुल 15 उम्मीदवार हैं, लेकिन असली भिड़ंत महागठबंधन बनाम एनडीए के बीच है। आरजेडी के शेख जियाउल हसन उर्फ जेड हसन और लोजपा (आर) के मिथुन यादव के बीच मुकाबला इतना कांटे का है कि चुनावी पंडित भी आखिरी निष्कर्ष पर दावा ठोकने को तैयार नहीं हैं।

वजह यह है कि दोनों के परंपरागत समीकरण एक-दूसरे की काट कर रहे हैं। ‘माई’ दो फाड़ में है – यानी आधा इधर, आधा उधर। अर्थात दोनों किसी तीसरे के भरोसे गंगा पार करने की जुगत में लगे हैं। इस जंग को अजय राय (जन सुराज) ने त्रिकोणीय बना दिया है। एक-एक वोट की कद्र इस बार नोट संग चोट से भी ज्यादा होगी। एक सांसद बता रहे थे… “नाथनगर का मिजाज भी बड़ा बेमिसाल है वह आखिरी रात किसी को ‘अनाथ’ तो किसी को ‘भोलेनाथ’ बना देता है।”

15 में से 4 उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले हैं – जिनमें मिथुन यादव (लोजपा-आर), मोहम्मद इस्माइल (एआईएमआईएम) और अजय राय (जन सुराज), जयकरण पासवान शामिल हैं। बाकी 11 बेदाग उम्मीदवार भी रणक्षेत्र में हैं – यानी वोटर चाहे तो ‘चरित्र बनाम चार्जशीट’ का भी फैसला कर सकता है। लेकिन ऐसा फैसला अब इतिहास बन चुका है।

मिथुन यादव, यादव समाज से आते हैं। वे जिला परिषद अध्यक्ष हैं और अपने इलाके में ‘मिथुन भैया’ नाम से मशहूर हैं। कहते हैं, जनता से उनका सीधा कनेक्शन ही उनका सबसे बड़ा हथियार है।

लेकिन यहां एनडीए का कुनबा एक साथ नहीं चल रहा। सिरदर्द यह है कि साथी ही सेंधमार बन रहे हैं – जदयू का वोट कौन रखेगा, कौन ले जाएगा, यह खुद एनडीए को भी समझ नहीं आ रहा। हालांकि नाथनगर में मतदाता आखिरी रात किसी एक को ‘अनाथ’ या ‘भोलेनाथ’ बनाने से गुरेज नहीं करते। उधर, एआईएमआईएम के मोहम्मद इस्माइल मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने की फिराक में हैं। दावे यह भी कि ‘माई’ तो ‘माई’ ठहरी, इसे ठगना अब आसान नहीं।

नाथनगर का समीकरण बड़ा दिलचस्प है। यहां मुस्लिम बनाम यादव के बीच जंग है, जबकि गंगोत्री, कुशवाहा और धानुक सहित बाकी अति पिछड़ा वर्ग मिलकर खेल बना या बिगाड़ सकते हैं। यहां हर जाति, हर मोहल्ला, हर टोला इस बार ‘किंगमेकर’ बनने के मूड में है।

नाथनगर की गलियों में सुबह की चाय और शाम की गपशप का नया टॉपिक है – “क्या मिथुन यादव एनडीए का तिलिस्म कायम रखेंगे या आरजेडी का किला बचा लेंगे जेड हसन?” कोई कहता है, “इस बार बदलाव तय है,” तो कोई जवाब देता है, “अंततः पिछली बार की तरह आरजेडी ही जीतेगी, भाई।”

इस चुनाव में भावनाएं, समीकरण और रणनीतियां – तीनों ही बराबर खेल रही हैं। नाथनगर की जनता इस वक्त राजनीतिक स्विंग मूड में है। चुपके-चुपके कभी जेड की तरफ झुकती है, तो कभी मिथुन के पाले में उड़ान भरती है। अब बस इंतजार है मतदान दिवस का। जब असली खेल खुलेगा और पता चलेगा कि नाथनगर की जनता ने किसकी ‘माया’ को चुना और किस ‘छाया’ को ठुकराया!

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