शुभानंद मुकेश, मुरारी, मिथुन, गोपाल मंडल ने भरा नामांकन, अर्जित चौबे ‘रन छोड़’ साबित हुए
गणादेश,भागलपुर :शनिवार का दिन भागलपुर जिले की सियासत में हलचल और फैसलों का दिन साबित हुआ। चुनावी रण में दावेदारों की आमद ने जहां एक ओर राजनीतिक पारे को गरमाया, वहीं कुछ नाम ऐसे भी रहे, जिन्होंने अंतिम घड़ी में चुप्पी साध ली। कहलगांव से लेकर गोपालपुर यानी गंगा के आर-पार तक नामांकन का माहौल कुछ यूं रहा जैसे शतरंज की बिसात पर खिलाड़ी अपनी चालें बिछा रहे हों। कहलगांव – शुभानंद मुकेश, पीरपैंती – मुरारी पासवान, गोपालपुर – गोपाल मंडल, नाथनगर – मिथुन यादव ने नामांकन दाखिल किया। वहीं अर्जित ने अपना बागी फैसला बदलते हुए नामांकन नहीं करने का फैसला किया।
एनडीए के घटक दल जदयू की ओर से कहलगांव सीट से कद्दावर नेता स्व. सदानंद सिंह के पुत्र शुभानंद मुकेश ने पूरी तैयारी और समर्थकों के जोश के साथ नामांकन दाखिल किया। जुलूस, नारेबाजी और ढोल-नगाड़ों के बीच शुभानंद ने यह जताने की कोशिश की कि मुकाबला आसान नहीं होगा। उनके समर्थकों ने इसे ‘नई ऊर्जा के साथ नई शुरुआत’ का नाम दिया। नामांकन के बाद शारदा पाठशाला के खेल मैदान में आयोजित सभा में कई मंत्रियों ने संबोधित कर चुनावी फिजा में शोर भर दिया।
भाजपा प्रत्याशी मुरारी पासवान ने पीरपैंती सीट से नामांकन दाखिल करते हुए एनडीए के प्रति मतदाताओं का भरोसा दोहराने की कोशिश की। उनके साथ मौजूद वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं ने संकेत दिए कि यहां पार्टी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ने वाली।
सबसे दिलचस्प नजारा रहा गोपालपुर में, जहां बागी तेवरों के लिए पहचाने जाने वाले गोपाल मंडल ने बतौर निर्दलीय नामांकन दाखिल किया। जदयू से टिकट कटने के बाद गोपाल मंडल का विरोध पटना तक चर्चा में रहा। नामांकन के क्रम में उनका दर्द भी छलका, आंखें भी भींगी। मुख्यमंत्री नीतीश के जयकारे भी लगाए। निर्दलीय चुनाव लड़ने के फैसले से उन्होंने साफ कर दिया कि उनके लिए जनता ही सबसे बड़ी पार्टी है। समर्थकों की भारी भीड़ और नारों की गूंज ने माहौल को गर्मा दिया।
जहां एक ओर अन्य क्षेत्रों में उम्मीदवार ताल ठोक रहे थे, वहीं भागलपुर विधानसभा सीट से सबसे चर्चित चेहरा अर्जित शाश्वत चौबे ने अंततः नामांकन न भरने का निर्णय लेकर सबको चौंका दिया।भाजपा से टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान किया था। पूर्व केंद्रीय मंत्री और वर्तमान सांसद अश्विनी चौबे के पुत्र होने के बावजूद अर्जित का यह कदम राजनीतिक गलियारों में तमाम अटकलों को जन्म दे गया। विपक्षी खेमे में इसे “रन छोड़” करार दिया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, जैसे ही भाजपा ने बिहार विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए अपने 40 स्टार प्रचारकों की सूची में अश्विनी चौबे का नाम शामिल किया, अर्जित के बागी तेवर ठंडे पड़ गए। सो, अर्जित का यह फैसला बहुतों को रत्तीभर भी नहीं चौंकाया। अर्जित ने कहा कि पार्टी नेतृत्व और माता-पिता के आदेश का सम्मान करते हुए बिना नामांकन किए वापस हो गया।



