जल में डूबा पुनर्वास, सड़क पर ज़िंदगी, घोघा के विस्थापितों की पीड़ा
भागलपुर। बाढ़ से त्रस्त बहियार में पुनर्वास का पर्चा मिलना, भागलपुर स्थित घोघा के दर्जनों विस्थापित परिवारों के लिए राहत नहीं बल्कि एक नई मुसीबत बन गया है। एसएच – 84 घोघा – पंजवारा मार्ग पर आरओबी निर्माण के दौरान रेलवे पूर्वी समपार की जद में आने वाले लोगों की जमीन अधिग्रहित की गई थी। प्रशासन ने नियमानुसार रैयतों को मुआवजा भी दिया और पुनर्वास के लिए जमीन का पर्चा थमा दिया, लेकिन जिस जगह उन्हें बसाने की योजना बनी, वह इलाका खुद बाढ़ की चपेट में रहने वाला निकला।
पुनर्वास के नाम पर दी गई यह जमीन घोघा प्रखंड के बहियार क्षेत्र में है, जहां दो से तीन किलोमीटर के दायरे में न तो कोई गांव है और न ही आबादी। बाढ़ के आगमन से लेकर समाप्ति तक यह इलाका तीन से चार महीने तक पूरी तरह जलमग्न रहता है। स्थानीय लोगों के अनुसार बाढ़ के दिनों में आवंटित स्थल पर दस से पंद्रह फीट तक पानी का जमाव हो जाता है। ऐसे में वहां घर बनाना तो दूर, पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है।
स्थिति यह है कि पर्चा हाथ में होने के बावजूद विस्थापित परिवार आज भी स्थायी छत से वंचित हैं। कोई किराये के मकान में रहने को मजबूर है तो कोई सड़क किनारे तिरपाल और झोपड़ी के सहारे जिंदगी गुजार रहा है। पुनर्वास की उम्मीद में भटकते इन लोगों की परेशानी यहीं खत्म नहीं होती। गांव के बिचौलियों ने ‘जगह परिवर्तन’ का झांसा देकर कई विस्थापितों से मोटी रकम भी वसूल ली है।
घोघा थाना क्षेत्र के जानीडीह निवासी विस्थापित ब्रह्मदेव मंडल, सुनील मंडल, मंटू मंडल और विलाश मंडल बताते हैं कि करीब सत्तर लोगों से प्रति व्यक्ति दो-दो हजार रुपये नकद लिए गए हैं। इसके बावजूद न तो जगह बदली गई और न ही कोई ठोस समाधान सामने आया। बिचौलियों के चक्कर में फंसे ये लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
विस्थापितों की एक ही मांग है कि उन्हें ऐसी उपयुक्त और सुरक्षित जगह पर पुनर्वास दिया जाए, जहां वे बिना बाढ़ के डर के अपना घर बना सकें और सम्मानजनक जीवन जी सकें। सवाल यह है कि प्रशासन की पुनर्वास नीति कब जमीन पर उतरेगी और कब इन लोगों की सड़क किनारे कट रही जिंदगी को सही मायने में राहत मिलेगी।



