56 पर भारी पड़ा 24, दिल्ली में बैठकर हो गया बड़ा खेला!

रांची: गणित के अनुसार 56 हमेशा 24 से बड़ा होता है, लेकिन झारखंड की राजनीति में इस बार 24 ने 56 को मात दे दी। राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी के पास जीत के लिए आवश्यक संख्या नहीं थी, जबकि महागठबंधन के पास पर्याप्त आंकड़ा होने के बावजूद उसका दूसरा प्रत्याशी चुनाव हार गया।
झामुमो ने सुरक्षित रणनीति अपनाते हुए दलित और संघर्षशील नेता बैद्यनाथ राम को मैदान में उतारा, जिनकी जीत लगभग तय मानी जा रही थी। दूसरी ओर कांग्रेस ने सहयोगी दलों से व्यापक सहमति बनाए बिना प्रणव झा को उम्मीदवार घोषित कर दिया। उस समय गठबंधन के भीतर मतभेद की चर्चाएं जरूर हुईं, लेकिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने हस्तक्षेप कर सब कुछ सामान्य होने का संदेश दिया था।
हालांकि चुनाव परिणाम ने अलग कहानी बयां कर दी। जिस उम्मीदवार के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं था, वह जीत गया और जिसके पक्ष में 56 विधायकों का समर्थन माना जा रहा था, वह हार गया। इसके बाद महागठबंधन के भीतर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।
राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज है कि क्या भाजपा और झामुमो के बीच किसी स्तर पर कोई रणनीतिक समझ बनी थी। सवाल उठ रहा है कि जब महागठबंधन के पास पर्याप्त संख्या थी तो फिर निर्दलीय उम्मीदवार की जीत कैसे संभव हुई। हालांकि इस संबंध में कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है, लेकिन अटकलों का बाजार गर्म है।
विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा चुनाव के नतीजे झारखंड की राजनीति में नए समीकरणों की ओर संकेत कर सकते हैं। साथ ही यह भी चर्चा है कि झामुमो अब राज्य की राजनीति में स्थायी रूप से बड़े भाई की भूमिका को और मजबूत करना चाहती है तथा कांग्रेस के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित कर सकती है।

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