सोनाली को मिला नया जीवन – जब सांप हार गया और सेवा जीत गई
प्रदीप विद्रोही,
भागलपुर। सावन का महीना था, रक्षाबंधन आने ही वाला था। कहलगांव के एक छोटे से गांव में 14 वर्षीय सोनाली कुमारी की दुनिया उस वक्त अंधेरे में डूब गई, जब 8 अगस्त की रात 3 बजे उसे एक जहरीले सांप ने काट लिया – शायद कोबरा या करैत। रात की खामोशी में चीखें गूंज उठीं। मां-बाप की आंखों में डर, भाई की आंखों में आंसू, और सोनाली की सांसें तेज़ी से धीमी होती जा रही थीं।
आखिरी उम्मीद बना – एनटीपीसी कहलगांव का जीवन ज्योति अस्पताल
अधमरी सोनाली को लेकर परिवारवाले भागे – एक ही नाम ज़ेहन में था: जीवन ज्योति अस्पताल।
यह वही अस्पताल है, जिसके बारे में गाँवों में सुनी कहावत है “अगर सांस बाकी है, तो जीवन ज्योति में जीवन बाकी है।”
जब सुबह 8 बजे सोनाली अस्पताल पहुंच, तब तक शरीर ज़हर से नीला पड़ने लगा था, पलकों पर थकान थी और धड़कनों में थमता सा जीवन। पर डॉक्टरों की टीम ने हार मानने से इनकार कर दिया। तुरंत इंट्यूबेशन, वेंटिलेशन और ज़हर के असर को रोकने की जद्दोजहद शुरू हो गई। हर साँस के साथ डॉक्टरों की धड़कनें भी बंधी थीं।
सिर्फ इलाज नहीं, उम्मीद भी मिली
सोनाली एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आती है। लेकिन इलाज का एक पैसा भी नहीं लिया गया। एनटीपीसी कहलगांव की सीएसआर पहल के अंतर्गत सारा इलाज निःशुल्क किया गया – इलाज, देखभाल, दवाइयाँ, सब कुछ।
और फिर आया वो पल…
रक्षाबंधन – जब राखी में जीवन की डोर बंध गई
एक दिन बाद, रक्षाबंधन के दिन, जब सोनाली की हालत में थोड़ा सुधार हुआ, उसने कांपते हाथों से अपने भाई को राखी बांधी। भाई की आंखें नम थीं – ये सिर्फ राखी नहीं थी, ये दूसरी बार जीवन से जुड़ने का धागा था।
अस्पताल जिसने सांसों की डोर थामी
दो दिन बाद, सोनाली पूरी तरह स्वस्थ हो गई। उसने वो पहला मुस्कुराता धन्यवाद दिया, जो डॉक्टरों, नर्सों और अस्पताल के हर सदस्य के लिए एक अविस्मरणीय उपहार था।
जीवन ज्योति अस्पताल हर साल करीब 350 सर्पदंश के मामलों का इलाज करता है। 20-30 मील दूर से लोग यहां सिर्फ एक विश्वास के सहारे आते हैं – कि यहां कोई अकेला नहीं मरता।
एनटीपीसी – रोशनी सिर्फ घरों में नहीं, ज़िंदगी में भी
यह कहानी सिर्फ एक मेडिकल केस नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवता की विजय है।
जहां एक तरफ एनटीपीसी कहलगांव देश को बिजली दे रहा है, वहीं दूसरी ओर वह अपने आसपास के समुदाय को जीवन की रोशनी भी दे रहा है – बिना भेदभाव, बिना अपेक्षा।
सोनाली की आंखों में अब सपना है — डॉक्टर बनने का, ताकि वह भी कभी किसी की साँसें थाम सके… जैसे किसी ने उसकी थामी थीं। यह सिर्फ इलाज नहीं था, यह एक वादा था – कि जब समाज साथ होता है, तो मौत भी मात खा जाती है।



