रांची विश्वविद्यालय में विचारोत्तेजक एवं बहुविषयक व्याख्यान श्रृंखला का आयोजन
रांची :UGC-MMTTC, रांची विश्वविद्यालय के प्रथम सत्र में गुरुवार को एक विचारोत्तेजक एवं बहुविषयक व्याख्यान श्रृंखला का आयोजन हुआ, जिसमें भारतीय ज्ञान परम्परा, पर्यावरणीय संकट, और परंपरागत ज्ञान की सुरक्षा जैसे समसामयिक विषयों पर विद्वानों ने अपने विचार साझा किए।
डॉ. धन्यनंजय वासुदेव द्विवेदी, विभागाध्यक्ष, संस्कृत विभाग, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, रांची ने “भारतीय ज्ञान परंपरा” विषय पर उद्घाटन व्याख्यान दिया। उन्होंने ‘भारत’, ‘ज्ञान’ और ‘परंपरा’ शब्दों की मूल व्याख्या करते हुए कहा कि ‘भारत’ शब्द ‘भा’ (प्रकाश) और ‘रत’ (अनुरक्त) से मिलकर बना है — यानी जो ज्ञान के प्रकाश से अनुरक्त है।
उन्होंने पाँच ज्ञानेंद्रियों, आस्तिक-नास्तिक दर्शन, मौखिक परंपरा, लोक-सममत और शास्त्र-सममत ज्ञान के संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित किया। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि साक्षरता नहीं, बल्कि ज्ञानवत्ता ही मानवता की पहचान है, अन्यथा ज्ञानहीन साक्षरता विनाशक भी हो सकती है। उन्होंने चार वेद, छह वेदांग, चार उपवेद, अठारह पुराण एवं पाँच वाङ्मय के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता को प्रस्तुत किया।
डॉ. प्रकाश सहाय, प्रख्यात चिंतक, ने अपने ओजस्वी वक्तव्य में समकालीन भारतीय समाज में हो रहे सांस्कृतिक और बौद्धिक क्षरण की ओर ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने कहा:
“भ्रष्टाचार की गंगोत्री बह रही है — यह कहने का अर्थ यह है कि अब पवित्रता के प्रतीक भी संदिग्ध हो गए हैं।और यह एक गहरी साजिश है.
भारत एक ऐसा देश है जो मशीनों में ईश्वर देखता आया है, पर आज स्वयं मनुष्य मशीन बनता जा रहा है। इसलिए IKS की जरूरत है.
भारत में गाय एक पशु नहीं बल्कि भगवान है, क्योंकि वो एकमात्र ऐसी पशु है,जिनका गोबर और मूत्र तक पवित्र एवं औषधीय माने जाते हैं।
उन्होंने व्यंग्यपूर्वक कहा कि लोग मर्सिडीज़ में बैठकर जिम जाते हैं और ट्रेडमिल पर साइकिल चलाते हैं, जबकि भारत में पारंपरिक घरेलू पद्धतियाँ सदैव स्वास्थ्यकेंद्रित रही हैं।
आज नाश्ते में बाजारवाद, हिंदी फिल्मों में अंग्रेज़ी उपशीर्षक, और संयुक्त परिवार का विघटन हमारी मूल पहचान को क्षीण कर रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जहाँ से पश्चिमी विज्ञान की सीमाएँ समाप्त होती हैं, वहीं से भारतीय भास का ज्ञान प्रारंभ होता है, अतः भारतीय ज्ञान परंपरा की पुनर्स्थापना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
डॉ. आलोक कुमार, एसोसिएट प्रोफेसर, विधि विभाग, सरला बिड़ला विश्वविद्यालय, ने “Protecting Traditional Knowledge: Legal Framework and Challenges (IPR)” विषय पर अपने व्याख्यान में परंपरागत ज्ञान की बौद्धिक संपदा के रूप में पहचान और उसकी वैश्विक स्तर पर रक्षा की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि कैसे भारतीय आदिवासी, ग्रामीण और परंपरागत समुदायों की जड़ी-बूटी, हस्तशिल्प, और मौखिक ज्ञान विश्व बाज़ार में अनुचित तरीके से दोहन के शिकार हो रहे हैं। उन्होंने भारतीय संविधान, WTO, TRIPS समझौते और Biological Diversity Act के तहत उपलब्ध संरक्षण तंत्र पर प्रकाश डाला।
डॉ. नितीश प्रियदर्शी, पर्यावरणविद् एवं भूविज्ञान विभाग, रांची विश्वविद्यालय, ने “बदलता पर्यावरण – पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर आज तक” विषय पर अत्यंत जानकारीपूर्ण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुति दी। उन्होंने पृथ्वी की भू-गर्भीय संरचना, जलवायु परिवर्तनों, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और जैव विविधता के संकट पर चिंता व्यक्त करते हुए यह भी बताया कि भारतीय ग्रंथों और पुराणों में पर्यावरणीय संतुलन को किस प्रकार से प्राथमिकता दी गई है।
समापन में, सभी वक्ताओं ने एकमत से यह संदेश दिया कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की राह है। इसे पुनर्जीवित करना और समसामयिक संदर्भों में व्यावहारिक रूप देना ही भारत को पुनः वैश्विक नेतृत्व में स्थापित कर सकता है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्राध्यापक, शोधार्थी, प्रशिक्षु शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।



