भागलपुर सदर सीट से टिकट की रेस में भाजपाइयों का ‘भौकाल’, मचा घमासान, कई गुटों की खींचतान

भागलपुर। भागलपुर सदर विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की स्थिति इस बार भी उलझी हुई है। यह सीट कभी पार्टी के वरिष्ठ नेता अश्विनी चौबे की मजबूत पकड़ मानी जाती थी, लेकिन उनके छोड़ने के बाद से भाजपा को यहां लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है। अब जबकि चुनावी वर्ष अपने चरम पर है, तो भाजपा के भीतर इस सीट को लेकर जबरदस्त खींचतान और घमासान मचा हुआ है। ढेर जोगी मठ उजाड़ की इस स्थिति से भाजपा अब भी नहीं उबर पा रही है।

‘भौकाल’ में दावेदार, नेतृत्व असमंजस में
सदर सीट से भाजपा टिकट के लिए छोटे से लेकर बड़े नेताओं तक, सभी अपने-अपने स्तर पर पूरा ‘भौकाल’ मचा रहे हैं। कोई संगठन की सेवा गिना रहा है, तो कोई अपनी जातीय पकड़ को आधार बना रहा है। इस सीट पर टिकट की लालसा ने पार्टी के भीतर अजीब सी बेचैनी और अंतर्कलह को जन्म दे दिया है। स्थिति यह है कि रेशमी नगरी भागलपुर में भाजपा नेताओं की गतिविधियां आमजन और कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा का विषय बन गई हैं।

गुप्त बैठकें और जातीय समीकरणों का खेल
ब्राह्मण, बनिया, मारवाड़ी, यादव और पान समुदाय से जुड़े भाजपा के नेता अपने-अपने समाज का हवाला देकर टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। जातीय समीकरणों के आधार पर टिकट को अपनी ओर खींचने के लिए लगातार गुप्त बैठकों का दौर जारी है। इन बैठकों में रणनीति बन रही है, लॉबीइंग चल रही है और एक प्रकार की ‘प्रेसर पॉलिटिक्स’ को हवा दी जा रही है। यह बेसुरी सियासी आवाज अब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक भी पहुंच चुकी है।

‘ढ़ेर जोगी मठ उजाड़’ की स्थिति :
पार्टी में टिकट के लिए जितने दावेदार हैं, उससे कहीं अधिक उनके समर्थकों और लॉबियों की होड़ लगी है। कई ऐसे नाम भी चर्चा में हैं जिनका जनाधार सीमित है, लेकिन राजनीतिक संबंधों और जातीय समीकरणों के सहारे वे खुद को मजबूत बताने में जुटे हैं। ऐसे में स्थिति ‘ढ़ेर जोगी मठ उजाड़’ जैसी हो गई है – यानी दावेदार कई, लेकिन परिणाम शून्य।

नेतृत्व की चुनौतियां और संभावित नुकसान
स्थिति को संभालने के लिए प्रदेश नेतृत्व की ओर से प्रयास तो किए जा रहे हैं, लेकिन अब तक यह प्रयास कारगर नहीं हो सके हैं। यदि यह अंदरूनी कलह ऐसे ही जारी रही, तो पार्टी को एक बार फिर सदर सीट पर हार का सामना करना पड़ सकता है।

इस सदर सीट पर टिकट को लेकर मचे इस सियासी कोलाहल ने यह साफ कर दिया है आने वाले वक़्त में भाजपा के लिए यह सीट आसान नहीं होगी। अगर समय रहते नेतृत्व ने सख्त निर्णय नहीं लिया, तो न केवल पार्टी की अंदरूनी एकता को नुकसान पहुंचेगा, बल्कि चुनावी जमीन भी खिसक सकती है।

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