अंगुल-चिह्न का इतिहास और बैंक
यूँ तो अंगुल-चिह्न का महत्व आपराधिक मामलों में विशेष रूप से होता है लेकिन बैंकिंग क्षेत्र में अंगुल-चिह्न (फिंगरप्रिंट) आधारित पहचान प्रणाली ग्राहकों के प्रमाणीकरण और सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है। पारंपरिक रूप से अंगूठे के निशान का उपयोग उन ग्राहकों की पहचान और सहमति के प्रमाण के रूप में किया जाता है जो हस्ताक्षर करने में सक्षम नहीं होते। वहीं, आधुनिक बैंकिंग में अंगुल-चिह्न (फिंगरप्रिंट) सेंसर और बायोमेट्रिक तकनीकों के माध्यम से खाताधारकों की पहचान सत्यापित की जाती है, जिससे लेन-देन अधिक सुरक्षित, तेज़ और विश्वसनीय बनते हैं। खाता खोलने, नकद निकासी, सरकारी लाभ वितरण, आधार-सक्षम भुगतान सेवाओं (AEPS), एटीएम प्रमाणीकरण तथा विभिन्न डिजिटल बैंकिंग सेवाओं में अंगुल-चिह्न (फिंगरप्रिंट) तकनीक का व्यापक उपयोग किया जाता है। इस प्रकार, अंगुल-चिह्न (फिंगरप्रिंट) आधारित प्रणालियाँ बैंकिंग सेवाओं को अधिक सुलभ, सुरक्षित और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
अंगुल-चिह्न का इतिहास कितना पुराना है यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता। फिर भी कई ऐसे प्रमाण मिले हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि इन चिह्नों को कई देशों में राजकीय चिह्न के रूप में अंकित किया जाता था। ईसा से 200 वर्ष पर्व चीनी शासकों द्वारा इन चिह्नों का उपयोग राजकीय मोहर के रूप में किया जाता था। प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि अंगुल-चिह्नों का प्रयोग राजकीय मोहर के रूप में 1278 ई में तुंग शासनकाल तक भी होता रहा। भारत में शाहजहाँ व अन्य मुगल शासको के समय “अति गोपनीय’ शाही दस्तावेजों पर मोहर के साथ बादशाह के ‘पंजा- चिह्न’ अंकित करने के प्रमाण मिलते हैं।
सन् 1823 में जर्मनी के जॉन परकिंजे तथा सन् 1868 में इटली के मारलेसो मेलपिजो व अन्य वैज्ञानिकों द्वारा अंगुल-चिह्न पर शोध कार्य प्रारम्भ किया गया। भारत में भी 1880 के आस-पास कई लोगों द्वारा अंगुल-चिह्नों के संदर्भ में शोध किये गये। बाद में बंगाल केपुलिस महानिरीक्षक सर रिचर्ड हैनरी ने इस दिशा में अपनी विशेष रुचि दिखाई और सन् 1886 में उन्होंने अंगुल-चिह्नों को मनष्य की व्यक्तिगत पहचान का मृख्य आधार बनाने कि लिए भारत सरकार को प्रस्ताव भेजा।
मार्च 1897 में कलकत्ता (कोलकाता) में ‘फिंगर प्रिंट ब्यरो’ की स्थापना की गई। यह भारत सरकार की ही नहीं बल्कि विश्व का पहला ‘फिंगर प्रिंट ब्यरो था। बाद में भारत शासन इस विधि की सरलता, सत्यता तथा सफलता से इतना प्रभावित हुआ कि एक विशेष कानून ‘एक्ट 5’ वर्ष 1899 इण्डियन काउन्सिल बनाकर अंगुल-चिह्न साक्ष्य को वैधानिक मान्यता प्रदान कर दी।
बैंकों ने भी वैज्ञानिक दृष्टिकोन अपनाया और अशिक्षित ग्राहको के बैंकिंग लेन-देन या बैंकिंग व्यवहार में ‘अंगुल-निशानीं को उनकी पहचान का आधार बनाया। आज भी बैंक अपने अशिक्षित ग्राहकों की पहचान उनकी अंगूठा-निशानी से ही करते हैं। बैंक पुरुषों के बाँए हाथ का तथा महिलाओं के दाहिने हाथ का अंगूठा पहचान चिह्न के रूप में अंकित करवाते हैं। यह एक परम्परा है इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इससे भविष्य में यह पता लगाने में आसानी रहती है कि बाँयें हाथ की अंगूठा निशानी पुरुष की तथा दाँये हाथ की अँगठा-निशानी महिला की होगी।
यह सत्य है कि अँगूठे या अँगुलियों पर विद्यमान रेखाएं स्थाई होती हैं। इनका आकार मानव शरीर के साथ घटता या बढ़ता है लेकिन इनकी आकृति, स्थिति तथा गठन में कोई परिवर्तन नहीं होता। इन्हें स्थाई रूप से हटाया या मिटाया नहीं जा सकता। चोट लग जाने के कारण ये रेखाएं थोडे समय के लिए अस्पष्ट तो हो सकती हैं लेकिन चोट ठीक हो जाने के पश्चात ये अपने मल स्वरूप में आ जाती हैं।
कभी भी दो व्यक्तियों की अंगूठा-निशानी पूर्ण रूप से एक समान नहीं हो सकती। यहाँ तक कि दो जुड़वाँ बच्चों के अंगुल चिह्न एक समान नहीं होते। अंगुल-चिह्न में कछ ऐसे बिन्द होते हैं जो उनमें भिन्नता दर्शाते हैं। कुछ सिद्धांतों को ध्यान में रखकर ही वैज्ञानिक श्री बोस ने कहा है अंगूठा निशानी तो लगवा लेते हैं लेकिन अँगठे की छाप में रेखाएंस्पष् रूप से दिखाई नहीं देतीं। ऐसी अँगठा-निशानी का कोई महत्व नहीं रहता ।” अतः “अंगुल-चिह्न’ या अँगठा-निशानी’ अंकित करवाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अँगठ साफ हो तथा इसके लिए पैड की काली या बैंगनी स्याही का प्रयोग किया जाना चाहिए क्योंकि इससे अँगठे की छाप स्पष्ट आती है। अँगठा लगाते समय न तो अँगठे को इधर-उधर घमाना चाहिए और न ही ज्यादा दबाव डालना चाहिए यह सत्य हैं कि आज अशिक्षित व्यक्ति भी अपने भविष्य के प्रति सजग है तथा भावी प्रयोजनों व आर्थिक सुरक्षा के लिए बैंक से जुडना चाहता है। आधुनिक बैंकिंग के इस दौर में बैंक सचना प्रौद्योगिकी की पहुँच ग्रामीण इलाकों में भी सनिश्चित कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादातर लोग अनपढ़ होते हैं। अतः उनकी सविधा हेत विशेष बायोमैटरिक एटीएम भी गाँवों मेंलगाये जा रहेहं। इन एटीएम में पिन नबर की जगह अँगुली के निशान से सत्यापन, ध्वनि द्वारा निर्देशित कमांडस एवं एनीमेटेड स्क्रीन द्वारा मार्गदर्शन आदि विशेषताएं हैं जिससे अनपढ व्यक्ति को एटीएम का प्रयोग करने में कोर्ड परेशान नहीं होती। ऐसे एटीएम भी बैंकों द्वारा तेजी से स्थापित किए जा रहे हैं। इससे न केवल वित्तीय समावेशन को बढावा मिलेग बल्कि बैंक अपनी उत्पादकता और कारोबार बढाने में सफल हो सकेंगे।
लेखक: विद्या भूषण मल्होत्रा,अधिकारी (सेवानिवृत्त)
पंजाब नेशनल बैंक, जयपुर
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