जतरा हमारी सांस्कृतिक आत्मा के साथ जल, जंगल और जमीन की रक्षा का भी संकल्प है : शिल्पी नेहा तिर्की

रांची: 21 पाड़हा जेठ जतरा, टेंगरिया (बेड़ो) में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि इस ऐतिहासिक एवं पारंपरिक आयोजन में शामिल होकर मन अत्यंत गौरव, आत्मीयता और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहरे जुड़ाव की अनुभूति से भर उठा।
उन्होंने कहा कि जेठ जतरा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि हमारे पुरखों की अमूल्य धरोहर, हमारी पहचान और हमारी सांस्कृतिक आत्मा का जीवंत प्रतीक है। सदियों से चली आ रही पाड़हा व्यवस्था, हमारी परंपराएं, रीति-रिवाज और सामुदायिक एकता आज भी हमें अपनी जड़ों से जोड़े हुए हैं तथा हमारी विशिष्ट आदिवासी पहचान को सशक्त बना रहे हैं।

मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि इस पावन अवसर पर विभिन्न गांवों से आए खोड़हा दलों ने पारंपरिक वेशभूषा, ढोल-नगाड़ों, लकड़ी के घोड़ों, झंडों एवं मनमोहक लोकनृत्यों के माध्यम से जो सांस्कृतिक छटा प्रस्तुत की, वह अत्यंत अद्भुत, जीवंत और हृदयस्पर्शी थी। यह दृश्य हमारी समृद्ध आदिवासी संस्कृति की जीवंतता, गौरवशाली विरासत और सामूहिक चेतना का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि आज के आधुनिक दौर में गांवों के लोग ही ऐसे पारंपरिक आयोजनों के माध्यम से हमारी संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। जतरा केवल सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह जल, जंगल और जमीन की रक्षा के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता को भी मजबूत करता है।
उन्होंने आगे कहा कि जनप्रतिनिधियों की यह जिम्मेदारी है कि वे ऐसे आयोजनों में सक्रिय भागीदारी निभाकर लोगों का मनोबल बढ़ाएं, उनकी परंपराओं का सम्मान करें और आने वाली पीढ़ियों तक अपनी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित पहुंचाने में सहभागी बनें।
इस अवसर पर उप प्रमुख मोदशिर हक, अजीत तिर्की, रोशन तिर्की, फ़हीमुल हक, शम्भू बैठा सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण एवं गणमान्य लोग उपस्थित थे।

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