झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में विकास देखना है तो चले आइए सिमडेगा..
रांची: झारखंड के सिमडेगा जिले के ठेठ सुदूरवर्ती इलाके में स्थित कैरबेड़ा गांव आज भी विकास की मुख्यधारा से पूरी तरह कटा हुआ है। यह गांव बरसात के मौसम में चारों ओर से पानी से घिर जाता है और टापू जैसा बन जाता है। गांव से बाहर निकलने के लिए कोई पक्का रास्ता नहीं है, जिससे लोगों को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यहां पहुंचने का एकमात्र साधन एक अस्थायी लकड़ी का पुल है, जिसे ग्रामीणों ने मिलकर तैयार किया है। इसी लकड़ी के सहारे वे नदी पार कर जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।
कैरबेड़ा के लोग हर रोज़ जान हथेली पर रखकर इस लकड़ी के पुल से गुजरते हैं। सबसे गंभीर समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी आपातकालीन स्थिति में मरीज को अस्पताल पहुंचाना होता है। गांव में सड़क न होने की वजह से एंबुलेंस या अन्य चारपहिया वाहन नहीं पहुंच पाते। ऐसे में मरीजों को खटिया पर लिटाकर नदी पार कर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है, जिससे कई बार समय पर इलाज नहीं मिल पाता और जान का जोखिम बढ़ जाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार प्रशासन से पुल और सड़क निर्माण की मांग की, लेकिन अब तक केवल आश्वासन ही मिले हैं। बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, राशन वितरण जैसी बुनियादी सुविधाएं भी गांव तक नियमित रूप से नहीं पहुंच पातीं।
कुल मिलाकर, कैरबेड़ा गांव की स्थिति राज्य में ग्रामीण विकास योजनाओं की पोल खोलती है। यह गांव प्रशासन और सरकार के लिए एक आईना है, जो बताता है कि आज भी झारखंड में कई गांव ऐसे हैं जहां लोगों को बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।



