अनुकंपा की उम्मीद, इंतज़ार का दर्द: डीईओ
भागलपुर। जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ) कार्यालय इन दिनों किसी सरकारी दफ्तर से ज्यादा एक उम्मीदों की मंडी बन गया है, जहां अनुकंपा नियुक्ति के इच्छुक आश्रित 45 दिनों से सुबह-शाम चक्कर लगा रहे हैं। लेकिन न तो टेबल बदलते हालात बदले, न ही फ़ाइलों ने रफ़्तार पकड़ी।
फाइलें ठहरीं, ज़िंदगी आगे नहीं बढ़ी
किसी का पिता, किसी का पति या भाई – जब सरकारी सेवा में रहते हुए किसी का निधन हो जाता है, तो परिवार के लिए सरकारी नौकरी की उम्मीद ही अंतिम सहारा होती है। लेकिन डीईओ कार्यालय में इन दिनों यही उम्मीद थकी-हारी प्रतीत हो रही है। बुधवार को जब आश्रितों को बुलाया गया, तो जिम्मेदार अधिकारी ही नदारद थे। खाली कुर्सियों और बंद दरवाज़ों ने फिर एक बार इन उम्मीदों पर ताला जड़ दिया।
हर बार एक नई टेबल, नई बहाना
आश्रितों का आरोप है कि फाइलें इधर से उधर घूमती हैं, लेकिन मंज़ूरी की मोहर नहीं लगती। नतीजा – मानसिक तनाव, आर्थिक तंगी और असमर्थता की ज़िंदगी। कुछ ने कहा कि अब घर चलाना भी मुश्किल हो गया है। हर दिन बस यही सवाल उठता है – नौकरी कब मिलेगी?
डीईओ कार्यालय बना निराशा का प्रतीक
जहां एक ओर सरकारी योजनाएं सुशासन का दावा करती हैं, वहीं ज़मीन पर ऐसी कहानियां ‘लापरवाही का चेहरा बनकर उभरती हैं। लोगों का कहना है कि अगर अब भी उनकी फाइलों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन तेज़ होगा।
चेतावनी: अब भी नहीं चेते तो उग्र रूप लेगा विरोध
आश्रितों ने साफ चेतावनी दी है कि अगर उन्हें जल्द नियुक्ति नहीं मिली, तो वह शांतिपूर्ण विरोध को उग्र आंदोलन में बदलने के लिए बाध्य होंगे। सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं, अब सम्मान और न्याय का भी बन चुका है।



