झारखंड के 25 वर्षों में क्या खोया, क्या पाया—आदिवासी संगठनों की परिचर्चा
रांची: आदिवासी समन्वय समिति, आदिवासी जन परिषद और झारखंड उलगुलान संघ ने संयुक्त रूप से “झारखंड के 25 वर्ष—क्या खोया, क्या पाया” विषय पर करमटोली स्थित धूमकुड़िया भवन में परिचर्चा आयोजित की। वक्ताओं प्रेमशाही मुंडा और लक्ष्मीनारायण मुंडा ने कहा कि 15 नवंबर 2000 को राज्य का गठन आदिवासी-मूलवासी समुदाय की लम्बी लड़ाई का परिणाम था। जंगल, जमीन, जल और खनिज संसाधनों पर अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण—ये मूल सपने थे।
लेकिन 25 वर्ष बाद ये सपने अधूरे दिखते हैं। CNT–SPT एक्ट के उल्लंघन और भूमि विवाद लगातार बढ़े हैं। आदिवासी भूमि हड़पने के मामले अदालतों में लंबित हैं जबकि स्थानीय नीति आज भी अधर में है। वक्ताओं ने बताया कि खनिज संपदा से राजस्व तो बढ़ा, लेकिन आदिवासी जिलों में गरीबी और बेरोजगारी जस की तस है। अवैध खनन, भ्रष्टाचार और संसाधनों की लूट से समुदाय सबसे अधिक प्रभावित हुआ है।
सरकारें विकास के दावे करती हैं, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की स्थिति अभी भी चिंताजनक है। आदिवासी प्रतिनिधित्व घटा है और सांस्कृतिक पहचान पर भी संकट बढ़ा है। परिचर्चा में निष्कर्ष निकला कि 25 वर्षों में झारखंड ने आर्थिक वृद्धि तो हासिल की, लेकिन आदिवासी समुदाय के मूल अधिकार और सपने अभी भी अधूरे हैं।



