AI और रोबोटिक तकनीक से लेकर बच्चों में बढ़ते मायोपिया तक पर हुई चर्चा
रांची : होटल चाणक्य बीएनआर में ऑल इंडिया ऑप्थल्मोलॉजिकल सोसाइटी और झारखंड ऑप्थल्मोलॉजिकल सोसाइटी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पांचवें AIOS मिड-टर्म सम्मेलन के दूसरे दिन आधुनिक नेत्र चिकित्सा और नई तकनीकों पर विशेषज्ञों ने मंथन किया। वैज्ञानिक सत्रों में AI, रोबोटिक सर्जरी, मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, रेटिना और बच्चों में बढ़ते मायोपिया पर चर्चा हुई।
AIOS की वाइस प्रेसिडेंट डॉ. चित्रा रामामूर्ति ने कहा कि मोतियाबिंद का संकेत सिर्फ धुंधला दिखाई देना नहीं है। रात में रोशनी से चकाचौंध, तेज रोशनी में परेशानी और रंगों को पहचानने में कमी भी इसके लक्षण हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि जब मोतियाबिंद के कारण रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगें, तभी सर्जरी की जरूरत होती है। फेको और फेम्टोसेकंड लेजर जैसी तकनीकों में भी सर्जन की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है।
AIOS के महासचिव डॉ. संतोष . होनावर ने बच्चों में रेटिनोब्लास्टोमा के प्रति सतर्क रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि फोटो में आंख की पुतली में सफेद चमक, अचानक भेंगापन, लगातार लालिमा या दृष्टि में कमी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच से आधुनिक उपचार के जरिए आंख और दृष्टि बचाने की संभावना रहती है।
वैज्ञानिक समिति की अध्यक्षा प्रो. (डॉ.) नम्रता शर्मा ने नेत्रदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया। वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ डॉ. हरबंस लाल ने कहा कि आंख में केमिकल पड़ने पर तुरंत साफ बहते पानी से धोना चाहिए और आंख को रगड़ना नहीं चाहिए।
AIOS के प्रेसिडेंट-इलेक्ट डॉ. मोहन राजन ने बच्चों में बढ़ते मायोपिया पर चिंता जताते हुए स्क्रीन टाइम कम करने और प्रतिदिन खुले मैदान में खेलने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि ग्लूकोमा शुरुआती दौर में बिना लक्षण के ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए नियमित नेत्र जांच बेहद जरूरी है।


