परिसीमन पर आदिवासी समाज की चिंता, राजनीतिक अधिकारों में कटौती स्वीकार नहीं : बंधु तिर्की
रांची: वर्ष 2026 के बाद प्रस्तावित लोकसभा एवं विधानसभा परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज की चिंताओं के बीच रविवार को रांची प्रेस क्लब में “परिसीमन का आदिवासी समाज पर प्रभाव एवं संभावित समाधान” विषय पर सेमिनार आयोजित किया गया। कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों, अधिवक्ताओं, शिक्षाविदों और विभिन्न आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
मुख्य वक्ता एवं पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड में परिसीमन के नाम पर आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कमजोर नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों में किसी प्रकार की कटौती का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जाएगा। उन्होंने कहा कि संविधान ने आदिवासी समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संरक्षण के लिए विशेष प्रावधान किए हैं, इसलिए आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने वाला कोई भी कदम संविधान की भावना के विरुद्ध होगा।
वक्ताओं ने कहा कि परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन का विषय नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के राजनीतिक अस्तित्व और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने वर्ष 2002 के परिसीमन प्रस्ताव का उल्लेख करते हुए बताया कि उस समय झारखंड में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों में कटौती का प्रस्ताव आया था, जिसे व्यापक जनआंदोलन के बाद वर्ष 2008 में रोक दिया गया।
सेमिनार में मांग की गई कि झारखंड में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित लोकसभा एवं विधानसभा सीटों में कोई कटौती न हो तथा पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता को सुरक्षित रखते हुए परिसीमन किया जाए। बैठक में परिसीमन संबंधी मुद्दों पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए एक ड्राफ्टिंग कमेटी गठित करने का भी निर्णय लिया गया।



