घोघा मिनी उद्योग का मजबूत आधार, ईंट-भट्ठों से खिलखिलाता श्रमजीवी जीवन

भागलपुर। जिले का घोघा क्षेत्र आज किसी पहचान का मोहताज नहीं है। यह इलाका अब केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि मिनी उद्योग के हब के रूप में उभर चुका है। यहां फैले दर्जनों ईंट-भट्ठे न सिर्फ स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, बल्कि सैकड़ों परिवारों के जीवन में स्थायित्व और खुशहाली भी ला रहे हैं। छठ पर्व से शुरू ईंट निर्माण की प्रक्रिया पथाई, बोझाई, पकाई और अंततः निकासी से गुज़रती है।

घोघा क्षेत्र में वर्तमान में लगभग 70 से 80 ईंट-भट्ठे संचालित हैं। इन भट्ठों के कारण स्थानीय मजदूरों के साथ-साथ बाहर से आने वाले श्रमिकों को भी हर साल करीब सात महीने तक निरंतर रोजगार मिल जाता है। एक-एक भट्ठे में औसतन 100 से 150 मजदूर कार्यरत रहते हैं। यही वजह है कि इस क्षेत्र के श्रमिकों को रोज़गार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने की मजबूरी नहीं झेलनी पड़ती।

इन ईंट-भट्ठों से आने वाले दिनों में करीब 40 करोड़ ईंटें बिहार, झारखंड और उत्तराखंड के इलाकों तक पहुंचगी, जिनकी हिस्सेदारी वहां के नव-निर्माण कार्यों में सुनिश्चित होगी।

ईंट-भट्ठों पर काम करने वाले मजदूर कठिन परिश्रम जरूर करते हैं, लेकिन उनके चेहरे पर संतोष साफ झलकता है। रोजगार पास में मिलने से परिवार साथ रहता है, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित नहीं होती और सामाजिक जीवन भी संतुलित बना रहता है। घोघा का यह श्रमजीवी समाज वास्तव में खुशहाल क्षेत्र – खुशहाल जीवन की मिसाल पेश करता है।

अग्नि प्रवेश के साथ शुरू होता है नया चक्र

पिछले 15 दिनों में लगभग 50 प्रतिशत ईंट-भट्ठों में अग्नि प्रज्वलन किया जा चुका है, जिसे भट्ठा मालिक ‘अग्नि प्रवेश’ के रूप में धार्मिक आस्था के साथ संपन्न करते हैं। इस अवसर पर भगवान विश्वकर्मा, अन्य देवी-देवताओं एवं अग्निदेव का विधिवत आह्वान किया जाता है। पूजा-अर्चना के बाद ही कच्ची ईंटों को पकाने का कार्य शुरू किया जाता है।

15 से 20 दिनों में ईंटें पककर तैयार हो जाती हैं और उत्तराखंड, पूर्व बिहार, कोशी, सीमांचल तथा झारखंड के खरीदार इन्हें खरीदकर ले जाते हैं।

अग्नि प्रज्वलन के 15 से 20 दिनों के भीतर नई लाल ईंटें तैयार होकर बाजार में आ जाती हैं। फिलहाल क्षेत्रवासियों को ये ईंटें सस्ते दामों पर उपलब्ध हो रही हैं, जिससे निर्माण कार्य में तेजी देखी जा रही है। हालांकि भट्ठा मालिकों का कहना है कि अप्रैल-मई के महीनों से ईंटों की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना रहती है।

घोघा के ईंट-भट्ठे केवल निर्माण सामग्री ही नहीं बनाते, बल्कि वे क्षेत्र के विकास, रोजगार और आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव भी तैयार कर रहे हैं। यह उद्योग आने वाले समय में और अधिक विस्तार पाकर घोघा को औद्योगिक नक्शे पर एक मजबूत पहचान दिला सकता है।

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