छः साल के लिए निष्कासित पूर्व भाजपा विधायक पवन यादव

भागलपुर। कहलगांव के पूर्व भाजपा विधायक और वर्तमान में छह वर्षों के लिए पार्टी से निष्कासित पवन यादव एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। टिकट कटने के बाद बागी तेवर अपनाते हुए पवन यादव ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में डटे रहकर पार्टी नेतृत्व की नाराज़गी मोल ली थी। परिणामस्वरूप न केवल उनकी जमानत जब्त हुई, बल्कि भाजपा ने भी उन्हें लंबी अवधि के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया।लेकिन अब, चुनावी धूल बैठते ही पवन यादव फिर उसी राजनीतिक गलियारे में सहज चाल से घूमते नज़र आ रहे हैं, जहां से उन्हें निष्कासन का फ़रमान मिला था। पटना में भाजपा कोटे के मंत्रियों से उनकी हालिया नज़दीकियों ने बिहार की राजनीति में नए सवाल खड़े कर दिए हैं।पवन यादव ने अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर एक के बाद एक कई तस्वीरें साझा की हैं। इनमें उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा, स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे, दिलीप जायसवाल, नितीन नवीन, श्रेयसी सिंह, प्रेम कुमार, संजय टाइगर, प्रमोद चन्द्रवंशी सहित कई भाजपा नेताओं और मंत्रियों से उनकी गर्मजोशी भरी मुलाक़ातें दर्ज हैं।

उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा है कि – ‘आज पटना में बिहार सरकार के नवनिर्वाचित उपमुख्यमंत्री महोदय सहित माननीय मंत्रिगण से सौहार्दपूर्वक भेंट कर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं प्रेषित कीं। बिहार विकास के नए अध्याय की ओर बढ़ रहा है और मेरा विश्वास है कि सुशासित एवं सशक्त बिहार के निर्माण में अब गति और व्यापकता दोनों बढ़ेंगी। प्रदेश हित और जनकल्याण की यह यात्रा अनवरत आगे बढ़े – जय बिहार!’ इसके साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी को भी शुभकामनाएं दी हैं।उनके इस आत्मीय संदेश ने राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाओं को हवा दे दी है। सवाल उठ रहा है – क्या भाजपा की ‘डिसिप्लिन बुक’ फिर खुलेगी। राजनीतिक जानकारों की मानें तो कहलगांव सीट पर एनडीए समर्थित जदयू प्रत्याशी शुभानंद मुकेश के विरुद्ध निर्दलीय के रूप में उतरना ही पवन यादव का सबसे बड़ा राजनीतिक जोखिम था। चर्चा यह भी है कि जिन लोगों की सलाह पर उन्होंने यह क़दम उठाया, वही अंत समय में उनसे किनारा करते दिखे। चुनाव का परिणाम भी कठोर रहा।जमानत जब्त और पार्टी से निष्कासन।अब सवाल यही है कि क्या भाजपा इस ‘बागी’ को दोबारा अपने खेमे में जगह देगी? भाजपा का इतिहास बताता है कि पार्टी कभी-कभी बागियों पर नरमी नहीं दिखाती है, लेकिन जब उनकी राजनीतिक उपयोगिता बनी रहे और संगठन को उनसे वास्तविक लाभ मिलता हो तो अलग बात।

कहलगांव से सटे विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के एक और बागी नेता अमन पासवान का उदाहरण यहां प्रासंगिक है। अमन पासवान भी इस बार टिकट के प्रबल दावेदार थे, उन्हें चाहने वालों की लंबी कतार थी। लेकिन आखिरी समय पूर्व में बागी रूप में चुनाव लड़ने का निर्णय ही उन्हें पार्टी की प्राथमिक सूची से बाहर कर गया। पार्टी ने अंततः उनके स्थान पर मुरारी पासवान का चयन किया। मतदाताओं ने मुरारी को सिर आंखों पर बिठाया और वे ऐतिहासिक जीत दर्ज कर विधानसभा पहुंचे। राजनीति में ‘अनुशासन’ भाजपा का घोषित मूलमंत्र है। ऐसे में जानकार मानते हैं कि पवन यादव को अमन पासवान के अनुभव से सीख लेनी चाहिए थी।

पवन यादव की इन मुलाक़ातों का असली संकेत क्या है? राजनीतिक गलियारों में एक ही सवाल तैर रहा है। क्या पवन यादव वापसी की बुनियाद तैयार कर रहे हैं या यह केवल ‘सौजन्य मुलाक़ात’ का राजनीतिक संस्करण है?

तस्वीरें इस ओर इशारा करती हैं कि पवन यादव अभी पूरी तरह भाजपा की छांव से बाहर नहीं होना चाहते। दूसरी तरफ, पवन बंद दरवाज़े की कुंडी खटखटाने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं। वैसे टिकट कटने की चर्चा के दौरान उनके आरजेडी की ओर भी हुलकी मारने की बातें आम थीं।

बहरहाल, पवन यादव की ये ‘पटना मुलाक़ातें’ आगे चलकर क्या गुल खिलाती हैं, यह तो वक़्त ही बताएगा। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह महज राजनीतिक शिष्टाचार था या वापसी की नई पटकथा का पहला अध्याय।

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