आदिवासी संगठनों की हुई बैठक, कुड़मी/कुरमी की एसटी मांग को बताया राजनीतिक साज़िश
रांची। नगड़ा टोली स्थित सरना भवन में शनिवार को आदिवासी संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रतिनिधियों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई। बैठक का केंद्र बिंदु रहा – कुड़मी/कुरमी समुदाय द्वारा अनुसूचित जनजाति (एसटी) दर्जा पाने की मांग और उसके खिलाफ उठे सवाल।
बैठक में सर्वसम्मति से यह विचार रखा गया कि कुड़मी/कुरमी समुदाय मूल आदिवासी नहीं, बल्कि ओबीसी श्रेणी से आते हैं। इन्हें एसटी का दर्जा देना असली आदिवासियों के संवैधानिक हक, आरक्षण, नौकरियों, जमीन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर अतिक्रमण होगा। संगठनों का आरोप है कि यह आंदोलन विभिन्न राजनीतिक दलों की मिलीभगत से चलाया जा रहा है ताकि जनता के असली मुद्दों – भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई – से ध्यान भटकाया जा सके।
बैठक में यह भी कहा गया कि झारखंड, बंगाल और ओडिशा में कुड़मी/कुरमी समुदाय के नेताओं द्वारा रेल रोको और धरना-प्रदर्शन जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जो पूरी तरह असंवैधानिक हैं। इससे रेलवे विभाग को करोड़ों का राजस्व नुकसान और यात्रियों को भारी असुविधा झेलनी पड़ रही है।
आदिवासी प्रतिनिधियों ने सवाल उठाया कि इतिहास में बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू जैसे महान आदिवासी आंदोलनकारियों के संघर्ष में कुड़मी/कुरमी की कोई भूमिका क्यों नहीं रही। इसके बावजूद उनके नेता इतिहास में जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
संगठनों ने यह भी मांग की कि इस विवाद का समाधान वैज्ञानिक आधार पर किया जाए। उन्होंने सुझाव दिया कि भारत सरकार एक स्वतंत्र समिति गठित करे, जो आधुनिक पॉपुलेशन जेनेटिक्स, डीएनए रिसर्च, सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण और सांस्कृतिक विश्लेषण के आधार पर निष्पक्ष जांच करे।
बैठक में यह भी कहा गया कि ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (2004) और केंद्र की मानव जाति विज्ञान रिपोर्ट (2015) पहले ही कुड़मी/कुरमी की एसटी मांग को खारिज कर चुकी है। इसके बावजूद राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति के लिए इस मुद्दे को हवा दे रहे हैं।
बैठक में एनजी बिरसा मुंडा के वंशज बुधराम मुंडा समेत लक्ष्मीनारायण मुंडा, निरंजना हेरेंज टोप्पो, फूलचंद तिर्की, डब्लू मुंडा, निशा भगत, अमर तिर्की, सरदार राहुल तिर्की, राकेश बड़ाईक, राजेश लिंडा, आकाश तिर्की और अन्य कई प्रतिनिधि व सैकड़ों लोग मौजूद रहे।



