अंग प्रदेश में श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक उल्लास से मनाया गया हरितालिका तीज व्रत

भागलपुर। भाद्रपद शुक्ल तृतीया के पावन अवसर पर पूरे अंग क्षेत्र में हरितालिका तीज व्रत श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। विशेषकर सुहागिन स्त्रियों द्वारा पति की लंबी उम्र और पारिवारिक सुख-शांति की कामना से यह व्रत निर्जल रहकर किया गया।

अंग क्षेत्र की परंपरा के अनुसार, माई पार्वती द्वारा भगवान शिव को पाने के लिए किया गया यह व्रत स्त्रियों में अडिग श्रद्धा और प्रेम का प्रतीक है। लोककथाओं में इसे माई के तीज कहा जाता है, और मान्यता है कि यह व्रत स्त्री के वैवाहिक जीवन में सुख और संतुलन लाता है।

 अंग की लोक-परंपरा में तीज

भागलपुर, बांका, नवगछिया, जमुई और खगड़िया के गांवों में महिलाओं ने पारंपरिक मिट्टी की पार्वती-शिव प्रतिमा बनाकर पूजा की। लाल-हरा चुनरी, महावर लगे हाथ, नथ, टिकुली, चूड़ियां और शृंगार का सामान तीज पूजन का हिस्सा रहा। स्त्रियां एकत्र होकर तेजस्विनी गीत, तीज के दिन माई के जोत उठे…, जैसे पारंपरिक लोकगीतों के साथ पूजा करती रहीं।

 लोक सांस्कृतिक वातावरण

रात्रि में जागरण, भजन-कीर्तन, और “कथा-गाथा” के आयोजन ने वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया। ग्रामीण अंचलों में युवतियां भी इस व्रत को मनाने लगी हैं, जिससे यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है।

 अंग की खास पूजा विधि

व्रत से एक दिन पूर्व महिलाएं नहाय-खाय करती हैं।तीज के दिन पूरे दिन निर्जल उपवास, और रात भर जागरण। अगली सुबह महिलाएं स्नान करके पारण करती हैं, और व्रत समाप्त करती हैं।

इस अवसर पर कई सामाजिक संगठनों ने व्रत से जुड़ी लोकपरंपराओं को सहेजने की आवश्यकता बताई। भागलपुर के संध्या महिला मंडल और सावित्री समूह द्वारा तीज कथा प्रतियोगिता, शृंगार प्रतियोगिता और लोकगीत गायन का आयोजन भी किया गया।

 हरितालिका तीज अंग क्षेत्र की स्त्रियों की आस्था, नारी शक्ति और पारिवारिक संस्कारों की जीवंत मिसाल है। यह व्रत आज भी गांव-देहात से लेकर नगरों तक, अपने मूल भाव को संजोए हुए है।

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