गोपाल बाबू का ‘बयानबाजी मौसम’ हुआ सक्रिय,हम कुछुओ नहीं बोलेंगे, सम्राट चौधरी मरवा देगा’

प्रदीप विद्रोही ,भागलपुर। बिहार की राजनीति में अगर बयानबाजी को ओलंपिक खेल का दर्जा मिल जाए, तो गोपालपुर विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक गोपाल मंडल शायद बिना क्वालिफायर खेले सीधे फाइनल में पहुंच जाएं। उनके बयान ऐसे होते हैं कि विरोधी माथा पकड़ लेते हैं, समर्थक मुस्कुरा देते हैं और मीडिया की हेडलाइन खुद-ब-खुद तैयार हो जाती है।
इस बार गोपाल मंडल ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को लेकर ऐसा बयान दे डाला कि राजनीतिक गलियारों में फिर हलचल मच गई। उनका कहना है कि ‘हम कुछुओ नहीं बोलेंगे, सम्राट चौधरी के खिलाफ बोलेंगे तो मरवा देगा।’ बयान सुनकर लोगों को समझ नहीं आया कि यह राजनीतिक चेतावनी है, भावनात्मक अभिव्यक्ति है या फिर गोपाल बाबू की उसी मशहूर ‘अतरंगी शैली’ का नया संस्करण। ताजा बयान में पूर्व विधायक गोपाल मंडल ने बांकीपुर विधानसभा चुनाव परिणाम को लेकर दो टूक कहा कि नीतीश कुमार नहीं रहे लोगों ने परिवर्तन ले लिया।
मजेदार बात यह है कि कुछ ही दिन पहले भागलपुर में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के दौरान यही गोपाल मंडल सुरक्षा घेरा और बांस की बैरिकेडिंग पार करते हुए सुरक्षाकर्मियों से लगभग विनती करते दिखाई दिए। उनका मासूम तर्क था – ‘अरे भाई, पूर्व MLA हैं… बूढ़े हो गए हैं… जाने दीजिए। सम्राट जी से मिलना है।’
राजनीति के जानकार कहते हैं कि बिहार में मौसम विभाग से ज्यादा तेजी से अगर किसी का रुख बदलता है तो वह राजनीतिक समीकरण हैं। और गोपाल मंडल तो मानो इस बदलाव के ब्रांड एंबेसडर हों। कभी सम्राट चौधरी पर तीखे हमले, कभी उन्हीं से मिलने की बेचैनी।दर्शकों के लिए यह किसी राजनीतिक वेब सीरीज के नए एपिसोड से कम नहीं। पूर्व में तो पीएम पर भी ये तंज कस चुके हैं।
दरअसल, गोपाल मंडल और सम्राट चौधरी के बीच बयानबाजी की कहानी नई नहीं है। दोनों नेताओं के बीच जुबानी जंग कई बार जदयू और भाजपा के रिश्तों में भी खटास घोल चुकी है। टिकट वितरण से लेकर चुनावी समीकरणों तक, हर मोड़ पर गोपाल बाबू के बयान राजनीतिक थर्मामीटर का पारा बढ़ाते रहे हैं।
कहा जाता है कि जब-जब टिकट की चर्चा तेज होती है, गोपाल मंडल की भाषा में भी नया ‘अपडेट’ आ जाता है। कभी तल्खी बढ़ जाती है, कभी नरमी लौट आती है। लेकिन इस बार शायद यही प्रयोग उन पर भारी पड़ गया। पिछले विधानसभा चुनाव में टिकट पैकेट में है बोलने वाले गोपाल बाबू का टिकट हाथ से निकल गया यानी वे बेटिकट हो गए। पश्चात बगावत का झंडा थाम चुनावी मैदान में कूद पड़े। जहां उनकी खूब फजीहत हुई।
लगातार विवादित बयानों से परेशान होकर जदयू ने आखिरकार उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। हालांकि पार्टी बदलने से उनकी शैली में कोई बदलाव नहीं आया। बयान वही पुराने बेबाक, बिंदास और कभी-कभी ऐसे कि राजनीतिक विश्लेषकों को भी शब्दकोश पलटना पड़ जाए।
वैसे गोपाल मंडल का राजनीतिक रिकॉर्ड केवल बयानों तक सीमित नहीं है। ट्रेन में उनके चर्चित प्रकरण से लेकर हत्या से जुड़े सनसनीखेज दावों तक, वे समय-समय पर ऐसी सुर्खियां बटोरते रहे हैं जिनमें मुद्दे कम और मसाला ज्यादा दिखाई देता है।
बिहार की राजनीति में एक कहावत बनती जा रही है। ‘जहां सन्नाटा हो, वहां गोपाल मंडल का एक बयान काफी है।’ अब देखना यह है कि उनका अगला राजनीतिक संवाद किसके पक्ष में जाएगा और किसके खिलाफ, क्योंकि गोपाल बाबू की राजनीति में स्थायी चीज अगर कोई है, तो वह है – अनिश्चितता।

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