सावन में झूलन महोत्सव की उमंग,खूंटी में पूजा पाठ तक सीमित

खूंटी:सावन का महीना आते ही बंगाल सहित देश के कई हिस्सों में झूलन महोत्सव की रौनक देखने को मिलती है। राधा-कृष्ण की भक्ति को समर्पित इस पर्व में मंदिरों और घरों में आकर्षक झूले सजाए जाते हैं। फूलों और रंग-बिरंगी सजावट से सजे झूलों पर राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं को विराजमान कर श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। सावन माह के शुक्ल पक्ष एकादशी से पूर्णिमा तक मंदिरों – ठाकुरबाड़ियों में सुंदर सुंदर मिट्टी के राधा- कृष्ण,ग्वाल बाल, गायें – चरवाहों की मुर्तियां होती हैं। खूंटी में भी वर्षों पहले 1977-78 से मुर्तिकार तपन घोष मुर्तियां बनाकर भगतसिंह चौक पर पांच दिवसीय भक्ति पर्व मनाते रहे। तत्पश्चात उनके ही छोटे भाई डॉ दीपक कुमार घोष भी भाई से कला सीखकर मुर्तियों की नुमाइश और पूजन किया करते थे। दीपक घोष की बनाई मुर्तियां बिल्कुल सजीव दिखती थीं।इनकी कलाकृतियों को लेकर 2021में प्राचीन कला केंद्र चंडीगढ़ द्वारा विशेष सम्मान मिला,सुर नंदन भारती कोलकाता द्वारा स्मृति चिन्ह और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया है। डॉ दीपक कुमार घोष विश्व भारती कलाकार परिषद नामक संस्था बनाकर मुर्तिकला, फिल्म कला के क्षेत्र में कार्यरत हैं। उन्होंने कहा यह पर्व राधे कृष्णा के पूजन पर आधारित है, सभी धार्मिक लोग भाग लेते हैं,खासकर बंगाली परिवार प्रतिदिन पूजा पाठ और प्रसाद वितरण करते थे। कोलकाता के दमदम श्यामनगर,नैहाटी आदि स्थानों की भव्यता देखते बनती है। अपने संस्मरण को याद करते हुए मुरहू के भगवत्प्रेमी डॉ धर्मेंद्र नाथ तिवारी ने बताया कि झूलन पूजा का आनंद अवर्णनीय होता है। इसमें भक्ति के साथ साथ कला-संस्कृति की झलक मिलती है।झारखंड में भी चक्रधरपुर, जमशेदपुर सहित रांची आदि में बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। अखिल भारतीय सांस्कृतिक विकास महासंघ के अध्यक्ष तपन घोष ने कहा कि बंगाल, ओडिशा, बिहार, और उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में झूलन महोत्सव के दौरान भजन-कीर्तन, संकीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। विशेषकर बंगाल और वैष्णव परंपरा वाले क्षेत्रों में इसका विशेष धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। सावन की हरियाली, लोकगीत और भक्ति संगीत इस उत्सव की सुंदरता को और बढ़ा देते हैं।
धर्मप्रेमी युवा ध्रुवेन्द्र भास्कर ने कहा कि झूलन महोत्सव केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि लोक संस्कृति, कला, संगीत और सामाजिक एकता का उत्सव भी है, जो पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है।

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