आदिवासी हुंकार महारैली में उमड़ा जनसैलाब, हेसल सरना समिति के बैनर तले उठी अस्मिता की गर्जना
गणादेश,रांची : राजधानी रांची शुक्रवार को आदिवासी हुंकार महारैली के ऐतिहासिक जनसैलाब की गवाह बनी। हेसल सरना समिति के बैनर तले हजारों की संख्या में आदिवासी भाई-बहन पारंपरिक भेष-भूषा, नगाड़ा, डोल और मांदर की गूंज के साथ सड़कों पर उतरे। यह रैली आदिवासी समाज के हक, अधिकार और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के लिए निकाली गई थी।मंच से वक्ताओं ने कहा कि आज आदिवासी संस्कृति, परंपरा और धार्मिक पहचान पर लगातार प्रहार हो रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुरमी समाज के कुछ लोग आदिवासी परंपराओं और पर्व-त्योहारों की नकल कर रहे हैं, जिससे सामाजिक सौहार्द्र और पारंपरिक पहचान को ठेस पहुंच रही है। वक्ताओं ने यह भी कहा कि कुरमी समाज मूल रूप से क्षत्रिय वर्ग का हिस्सा है, जिन्हें धर्मग्रंथों में लव-कुश के वंशज बताया गया है, इसलिए वे स्वयं को आदिवासी घोषित कर समाज को गुमराह नहीं कर सकते।
सभा में मौजूद नेताओं — गीता कुजुर, रेणु तिर्की, बाबू टोप्पो, बिट्टू कुजुर, झलकी उरांव, अपना कुजुर, विक्की तिर्की, विष्णु तिर्की, जीतू तिर्की, गौतम कुजुर, अनुप खलखो, सागर उरांव, अमन कुजुर और रंजीत उरांव — ने एक स्वर में कहा कि आदिवासी समाज अपनी धार्मिक परंपरा, सरना संस्कृति और सामाजिक एकजुटता के साथ किसी भी साजिश का डटकर मुकाबला करेगा।
मौके पर वक्ताओं ने आदिवासी बहनों के साथ हुई अभद्रता की घटनाओं पर भी कड़ी नाराजगी व्यक्त की और चेतावनी दी कि समाज की गरिमा से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। रैली के दौरान “हमारी संस्कृति हमारी पहचान” के नारों से पूरा माहौल गूंज उठा।



