भागलपुर में जीवंत है परंपरा और आस्था का संगम, दुर्गा बाड़ी, काली बाड़ी में गूंज उठी संस्कृति की सौगात
भागलपुर। शंख, ढाक और धुनुची की लय के बीच भागलपुर की दो ऐतिहासिक धरोहरें – दुर्गा बाड़ी और काली बाड़ी एक बार फिर सदी पुरानी परंपराओं को संजोए हुए दुर्गा पूजा के उल्लास में सराबोर हो चुकी हैं। ये महज पूजा स्थल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक समरसता और ऐतिहासिक विरासत के जीवंत प्रतीक हैं।
171 साल की परंपरा, 109 साल की संरचना
बंगाली टोला स्थित आर्य धर्म प्रचारिणी सभा जिसे आमतौर पर हरि सभा या दुर्गा बाड़ी कहा जाता है, इस वर्ष 171वीं दुर्गा पूजा मना रही है। मौजूदा परिसर को 109 साल पहले कानूनी मान्यता मिली, और तब से यह आयोजन निष्ठा, गरिमा और अनुशासन का उदाहरण बना हुआ है।
वहीं, मानिक सरकार स्थित काली बाड़ी में दुर्गा पूजा 1904 से लगातार हो रही है और इस बार यह 121वीं वर्षगांठ मना रही है। यहां की पूजा परंपरागत बारोवारी स्वरूप में होती है यानी पूरे समुदाय की भागीदारी, जहां हर घर का सदस्य पूजा का हिस्सा बनता है।
धार्मिक नहीं, सांस्कृतिक भी है यह उत्सव
ढाक की गूंज, धुनुची नृत्य और शुद्ध परंपरा – दुर्गा बाड़ी में हर क्रिया विधिवत होती है। खास बात यह कि यहां रोज़ाना भगवान शिव की पूजा भी की जाती है। 1926 में खुदाई के दौरान शिवलिंग के प्रकट होने के बाद से यह परंपरा आज तक जारी है।
सौहार्द की मिसाल: अल्पसंख्यकों से भी मिलती है आस्था की भेंट
दुर्गा बाड़ी को न केवल हिंदू समुदाय, बल्कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोग भी दान देते हैं — जो इस आयोजन को धार्मिक एकता और सांप्रदायिक सौहार्द का उदाहरण बनाता है।
✍️ साहित्य और कला की छाप
यह पूजा केवल देवी की आराधना नहीं, बल्कि साहित्य और कला का उत्सव भी है। पूजा समितियां गर्व से उन दिनों को याद करती हैं जब शरत चंद्र चट्टोपाध्याय, डॉ. बलईचंद मुखोपाध्याय (बनफूल) और दिव्येंदु पालित जैसी हस्तियां इन आयोजनों से जुड़ी थीं।
नाटक, गीत और सांस्कृतिक रंग
निरुपम कांती पाल, देबयानी डे और चंदन रॉय जैसे आयोजकों का कहना है, “हम उस समय में पूजा की पारंपरिकता को जीवित रखना चाहते हैं, जब आधुनिकता में संस्कृति पीछे छूट रही है।” रंगमंच, नाट्य प्रस्तुतियाँ और धुनुची नृत्य से यह आयोजन हर दिन नया रंग भरता है।
काली बाड़ी में तीन देवियों का आराधन
यहां दुर्गा, काली और लक्ष्मी की संयुक्त आराधना होती है। आयोजक सुप्रतिम पाल, शुभंकर बागची और अम्लान डे के अनुसार, “पूजा के दौरान टैगोर, शरत चंद्र, और सुकुमार रॉय के साहित्य पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन को खास और आनंददायक बनाते हैं।”
भाषा, भक्ति और भावनाओं का संगम
पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, बांका, मुंगेर, साहेबगंज और गोड्डा तक से बंगाली परिवार भागलपुर आते हैं। वहीं, जो लोग सालों पहले बंगाल चले गए थे, वे इस मौके पर अपने पुराने रिश्तों और भावनाओं को फिर से जीने लौटते हैं। दुर्गा बाड़ी और काली बाड़ी की यह पूजा सिर्फ धर्म नहीं, संस्कृति, समरसता और स्मृति की यात्रा है जो हर साल भागलपुर को कुछ दिनों के लिए एक जीवंत, सांस्कृतिक तीर्थ में बदल देती है।



