निराश और हताश हो चुकी महिलाओं की सूनी गोद भरने का नाम है डॉ किरण जायसवाल

पल्लव,गोड्‌डा, स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ किरण जायसवाल अक्तूबर माह में 75 साल की हो जाएगी। शरीर अब जबाव देने लगा है। फिर भी बच्चे के लिए निराश और हताश हो चुकी महिलाऐं इसका पीछा छोड़ती ही नहीं है। इलाज शुरू होने के बाद कम महिला ही इसके दरबाजे से निराश लौटी हैं। अधिकांश का सूनी गोद किलकारी से भर कर वापस लौटी है। पीएचईडी में एक अभियंता थे, उमाकांत मेहता। उसको तीन लड़की थी। लड़की भी अच्छी बड़ी- बड़ी हो गई थी। उनकी पत्नी को हारमोन्स से संबंधित समस्या थी। कई जगह डॉक्टरों को दिखलाते- दिखलाते इंजीनियर मेहता परेशान हो गए। एक दिन किसी ने सलाह दिया कि आप डॉ किरण जायसवाल से मिलें। वे अपनी पत्नी के साथ मिले और उसकी पत्नी दवा की दो ही खुराक खाई। इसी दौरान वह गर्भवती हो गई और एक पुत्र जन्म लिया, जिसका नाम आलोेक है। इसके ऐसा अनगिनत लोग आए और सुनी गोद बच्चों की किलकारी से भर गया। डॉ किरण जायसवाल का हाथ इतना तेज चलता है कि सीजर द्वारा प्रसव कुछ ही घंटों में करा देती हैं। वह जब सीजर के लिए औजार पकड़ती थी ताे लगता था कि इसपर भगवती की कृपा बरस रही है। बंध्याकरण के कैंप में भी इतना फास्ट ऑपरेशन करती कि बगल वाले डॉक्टर देखकर आश्चर्य करते।

कौन है डाॅ किरण जायसवाल
डॉ किरण जायसवाल का जन्म भागलपुर में हुआ। जब वह महज छह साल की थी तो इसके पुलिस इंसपेक्टर पिता सुरेश प्रसाद जायसवाल का निधन हो गया। उस समय इसकी मां महज 35 साल की थी। डॉ किरण जायसवाल का भाई तो महज चार साल का ही था। कठिन परिस्थिति के बीच डॉ किरण जायसवाल का बचपन बीता। पिता का पैतृक संपत्ति एकचारी के पास था। वहीं से अनाज और अन्य समान आता और उसकी मां बच्चों का पालन करती। वर्ष 1967 में डॉ जायसवाल ने गर्ल्स हाई स्कूल भागलपुर से मैटिक की परीक्षा पास की। बचपन से ही किरण जायसवाल पढ़ने में तेज थी। आईएससी एस एम कॉलेज भागलपुर से पास की। वर्ष 1969 तक अंक के आधार पर ही मेडिकल कॉलेज में नामांकन होते रहा था। दरभंगा विश्वविद्यालय के छात्रों काे इतना अधिक अंक आता कि दूसरे विश्वविद्यालय के बच्चे मेडिकल कॉलेज में नामांकन में पिछड़ जाते। इसका भी विराेध हुआ । फिर वर्ष 1970 से प्री मेडिकल टेस्ट(पीएमटी) के द्वारा नामांकन शुरू हुआ। डॉ किरण जायसवाल प्रतियोगी परीक्षा में पहली ही वार सफल हो गई। मेडिकल कॉलेज में नामांकन के लिए सफल होने के बाद इनकी मां कहने लगी कि हम तुमको मेडिकल कॉलेज में नहीं पढ़ा पाऐंगे। सब रूपया पढ़ाने में ही खर्च हो जाएगा तो तुम्हारी शादी कैसे कराऐंगे? शुरू से ही जिंद पर अड़ने वाली डॉ किरण जायसवाल ने हार नहीं मानी, और उसकी मां ने इसका नामांकन रिम्स रांची में करा दिया।

रिम्स से ही एमबीबीएस और पीजी
डॉ किरण जायसवाल ने वर्ष 1976 में एमबीबीएस पूरा कर ली। एमबीबीएस करने के बाद इनकी शादी डॉ शिवशंकर भगत के साथ हुई। डॉ शिवशंकर भगत पंजवारा के रहने वाले थे। शादी के बाद डॉ किरण जायसवाल पंजवारा में निजी प्रैक्टिस करने लगी। तेज दिमाग और हाथ साफ रहने के कारण वहां भी प्रैक्टिस दौड़ने लगा। वर्ष 1981 में बीपीएससी द्वारा डॉक्टरों की नियुुक्ति हेतू विज्ञापन निकला और पहली ही वार में डॉ किरण जायसवाल सफल हो गई। इसका प्रथम नियुक्ति देवघर जिला के मोहनपुर में हुआ। कुछ साल वहां सेवा देने के बाद डॉ जायसवाल पीजी में नामांकन के लिए सफल हो गई। मोहनपुर से वह फिर से रिम्स पढ़ने के लिए चली गई। वर्ष 1988 में पीजी पास कर गोड्‌डा सदर अस्पताल में पीपी प्रोग्राम में नियुक्ति हो गई। इसके बाद दुमका, सदर प्रखंड गोड्‌डा प्रभारी रहते हुए स्पेशलिस्ट डॉक्टर के तहत फिर सदर अस्पताल गोड्‌डा में याेगदान की और वर्ष 2016 में सेवानिवृत हो गई। अब शरीर जबाव देने के कारण रोगी को डाॅ किरण जायसवाल देखना नहीं चाहती हैं, लेकिन लोगों के जिंद के कारण अभी भी कुछ रोगी को डाॅ जायसवाल देख ही लेती है। इसकी बेटी डॉ पूजा भगत पटना में डॉक्टर है।

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