दिल्ली के जंतर-मंतर पर सक्रिय दिखने वाले कथित नेता झारखंड के आंदोलन से क्यों हैं दूर?
रांची : नीट जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर सड़क से लेकर संसद तक मुखर रहने वाले कई स्वयंभू छात्र हितैषी और सामाजिक कार्यकर्ता झारखंड में चल रहे जेपीएससी-जेएसएससी अभ्यर्थियों के आंदोलन को लेकर खामोश क्यों हैं? यह सवाल अब आंदोलनरत छात्र और युवाओं के बीच भी उठने लगा है।
रांची में पिछले कई दिनों से छात्र भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और पारदर्शी जांच की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल, बाहरी फंडिंग या प्रचार-प्रसार के सहारे नहीं, बल्कि अपने भविष्य और अधिकारों की लड़ाई के लिए किया जा रहा है।
आलोचकों का आरोप है कि जो चेहरे राष्ट्रीय स्तर के आंदोलनों में लगातार सक्रिय दिखाई देते हैं, वे झारखंड के इस छात्र आंदोलन से दूरी बनाए हुए हैं। उनके अनुसार, यदि यही घटनाएं किसी अन्य राज्य में होतीं, तो संभवतः कई बड़े चेहरे धरना-प्रदर्शन में नजर आते। वहीं कुछ लोग इसे राजनीतिक सुविधा और चयनात्मक सक्रियता का उदाहरण भी बता रहे हैं।
आंदोलन से जुड़े छात्रों का कहना है कि उनकी लड़ाई पूरी तरह शांतिपूर्ण है। वे किसी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाए बिना अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका उद्देश्य केवल निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कार्रवाई और योग्य अभ्यर्थियों को न्याय दिलाना है। छात्रों ने कहा कि दिल्ली के जंतर-मंतर में आजादी-आजादी का नारा देने वाले कहां गायब हो गए।
हालांकि, इस विषय पर जिन नेताओं या संगठनों की आलोचना की जा रही है, उनकी ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में यह बहस लगातार तेज हो रही है कि क्या छात्र आंदोलनों के प्रति समर्थन राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार तय किया जा रहा है, या इसके पीछे कोई अन्य कारण हैं।


