अब रसायन नहीं, प्रकृति के रंग से सजेगी सुहाग की मांग

@बीएयू सबौर के शोध से तैयार होगा प्राकृतिक सिंदूर, रमासी बना ‘सिंदूर ग्राम’, किसानों और महिलाओं के लिए खुले रोजगार के नए रास्ते।कुलपति डॉ. डीआर सिंह और कहलगांव के विधायक शुभानंद मुकेश ने संयुक्त रूप से सीता सिंदूर (बिक्सा ओरियाना) के पौधे लगाकर अभियान की शुरुआत की।

प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। भारतीय परंपरा में सिंदूर केवल एक श्रृंगार नहीं, बल्कि सुहाग, आस्था और संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। लेकिन वर्षों से बाजार में मिलने वाला अधिकांश सिंदूर रासायनिक तत्वों से तैयार होता रहा है, जिसमें लेड (शीशा) और मरकरी (पारा) जैसी भारी धातुओं की मौजूदगी स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है। अब इस चिंता का समाधान बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर ने खोज निकाला है। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने पौधों से तैयार प्राकृतिक सिंदूर विकसित कर इसे प्रयोगशाला से बाजार तक पहुंचाने की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है।
इसी पहल को आगे बढ़ाते हुए शनिवार को बीएयू, सबौर ने कहलगांव प्रखंड के रमासी गांव को ‘सिंदूर ग्राम’ के रूप में अंगीकृत किया। यहां तकनीकी हस्तांतरण, प्रदर्शन और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें कुलपति डॉ. डीआर सिंह और कहलगांव के विधायक शुभानंद मुकेश ने संयुक्त रूप से सीता सिंदूर (बिक्सा ओरियाना) के पौधे लगाकर अभियान की शुरुआत की। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के निदेशक, वैज्ञानिक, अधिकारी, कर्मचारी, किसान, ग्रामीण महिलाएं और बड़ी संख्या में स्थानीय लोग मौजूद रहे।
शोध से स्टार्टअप तक पहुंची तकनीक
विश्वविद्यालय के निदेशक डॉ. ए. के. सिंह के मार्गदर्शन में वैज्ञानिक डॉ. वी. शाजिदा बानो ने बिक्सा ओरियाना (अन्नाटो) पर शोध कर प्राकृतिक सिंदूर तैयार करने की तकनीक विकसित की। इस पौधे में मौजूद बिक्सिन नामक प्राकृतिक रंगद्रव्य को उन्नत निष्कर्षण, स्थिरीकरण और वैज्ञानिक सूत्रीकरण के माध्यम से इस तरह तैयार किया गया कि सिंदूर का रंग अधिक आकर्षक, टिकाऊ और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाला बन गया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्राकृतिक सिंदूर पूरी तरह विषैले रसायनों से मुक्त है। इसमें लेड और मरकरी जैसी भारी धातुएं नहीं हैं, जो कृत्रिम सिंदूर में अक्सर पाई जाती हैं। ऐसे में यह महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए कहीं अधिक सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है।
बिहार सरकार ने दिया 10 लाख का अनुदान
बीएयू के इस नवाचार को व्यवसायिक रूप देने की जिम्मेदारी कटिहार की उद्यमी रीना सिंह ने स्टार्टअप के रूप में संभाली है। विश्वविद्यालय की सब एग्रीस परियोजना के तहत इस पहल को बढ़ावा दिया गया है। बिहार सरकार ने प्राकृतिक सिंदूर के व्यवसायिक उत्पादन के लिए स्टार्टअप को 10 लाख रुपये का अनुदान स्वीकृत किया है। अब उत्पादन इकाई स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसके साथ ही सिंदूर के पौधों की संगठित खेती का भी विस्तार किया जाएगा।
किसानों और महिलाओं के लिए बनेगा नया अवसर
विश्वविद्यालय का मानना है कि प्राकृतिक सिंदूर केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने वाला अभियान साबित हो सकता है। सिंदूर के पौधों की खेती से किसानों को नई नकदी फसल मिलेगी, वहीं प्रसंस्करण और उत्पादन के माध्यम से महिलाओं के लिए स्वरोजगार और उद्यमिता के अवसर बढ़ेंगे। स्वयं सहायता समूहों को भी इससे जोड़ने की योजना बनाई जा रही है, जिससे गांवों में रोजगार का नया मॉडल विकसित हो सके।
‘लोकल से ग्लोबल’ की ओर बढ़ता कदम
कार्यक्रम के दौरान कुलपति डॉ. दुनिया राम सिंह ने कहा कि बिक्सा ओरियाना से तैयार प्राकृतिक सिंदूर का सफल व्यावसायीकरण किसानों, महिला उद्यमियों और लघु उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा करेगा। इससे ग्रामीण रोजगार, कृषि उत्पादों में मूल्य संवर्धन और जैव प्रौद्योगिकी आधारित उत्पादों के विकास को नई गति मिलेगी। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक रंग, सौंदर्य प्रसाधन और पोषण उत्पादों के क्षेत्र में बिहार की यह पहल राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान बना सकती है।
विश्वविद्यालय के अनुसार, रमासी को ‘सिंदूर ग्राम’ के रूप में विकसित करने का उद्देश्य केवल पौधारोपण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे प्राकृतिक सिंदूर उत्पादन, प्रशिक्षण, तकनीकी हस्तांतरण और ग्रामीण उद्यमिता का मॉडल गांव बनाना है। यह पहल प्रधानमंत्री के “वोकल फॉर लोकल, लोकल टू ग्लोबल” के संकल्प को भी मजबूत करेगी।
यदि यह परियोजना सफल रहती है तो आने वाले समय में बिहार का प्राकृतिक सिंदूर देश ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी अलग पहचान बना सकता है। इससे महिलाओं को सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्प मिलेगा, किसानों की आय बढ़ेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा मिलेगी।

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