रजत जयंती केवल उत्सव नहीं, झारखंड की आत्मा को बचाने का आह्वान है

झारखंड, बिरसा मुंडा की धरती, आज अपनी रजत जयंती मना रहा है। 15 नवम्बर 2000 को जन्मे इस राज्य की नींव “जल, जंगल, जमीन” के अधिकार पर रखी गई थी, पर 25 वर्षों बाद भी आदिवासी-मूलवासी समाज अपने ही घर में उपेक्षित है।खनिजों की खान होने के बावजूद झारखंड गरीबी, पलायन और विस्थापन से जूझ रहा है। विकास की चमक के पीछे 65 लाख से अधिक आदिवासी विस्थापित हुए हैं। बेरोजगारी 18% तक पहुंची, सिंचाई केवल 12% भूमि पर सीमित है। स्थानीय नीतियां और पेसा कानून अब भी अधूरे हैं।खनन राजस्व की लूट, भ्रष्टाचार और नौकरशाही की लालफीताशाही ने योजनाओं को कागजों तक सीमित कर दिया। कोयला माफिया की पकड़ ने राज्य की अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया।रजत जयंती के इस अवसर पर जरूरत है आत्ममंथन की — झारखंड को फिर से झारखंडियों का बनाने की। जब तक “जल, जंगल, जमीन” के अधिकारों की रक्षा नहीं होती और हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन नहीं मिलता, तब तक यह उत्सव अधूरा रहेगा।

विजय शंकर नायक, केन्द्रीय उपाध्यक्ष, आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच, पूर्व विधायक

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