सदियों के साए में बांका: जब गांधी लौटे सौ साल बाद
भागलपुर। दिन वही था – 3 अक्टूबर, पर साल बदल चुका था। 1925 की वह ऐतिहासिक सुबह, जब महात्मा गांधी ने बांका की धरती पर कदम रखा था, आज से ठीक 100 वर्ष बाद फिर एक बार जीवंत हो उठी। फर्क बस इतना था कि इस बार गांधी साक्षात नहीं, विचार बनकर लौटे। जन-जन की श्रद्धा में, स्मृतियों के फूलों में, और उस प्रतिमा पर चढ़े हारों में, जो गांधी चौक पर खामोशी से इतिहास की गवाही दे रही थी।
गांधी के आगमन की इस शताब्दी बेला पर बांका के जिलाधिकारी श्री नवदीप शुक्ला ने गांधी चौक स्थित प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। उनके साथ कई विचारशील चेहरे, बुद्धिजीवी, राजनीतिक कार्यकर्ता और समाजसेवी मौजूद थे – जैसे कि गांधी विचार विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. मनोज कुमार, शोभनपुर आश्रम के संचालक श्री मनोज मीता, तिलकामांझी विश्वविद्यालय के प्रो. उमेश नीरज, और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता श्री माहेश्वरी यादव।
जिलाधिकारी ने इस अवसर को “बांका का सौभाग्य” बताया और कहा कि “आज की दुनिया हिंसा और असहिष्णुता से जूझ रही है, ऐसे में गांधी का मार्ग ही सबसे बड़ा समाधान है।”
शोभनपुर आश्रम के प्रभारी श्री मनोज मीता ने गांधी जी के दौरे की एक अनकही बात साझा की – “गांधी जी तो याद रहे, लेकिन उस आयोजन की अध्यक्षता करने वाले मौलाना शफी साहब की स्मृति आज भी अधूरी है।” उन्होंने सामूहिक शोध और दस्तावेजीकरण की मांग की, ताकि वह इतिहास जो छूट गया, वह भी सामने आ सके।
प्रो. मनोज कुमार ने गांधी को “विचार का नाम” बताते हुए कहा कि “हमें गांधी के उस संदेश को फिर से जन-जन तक पहुंचना है , जो उन्होंने बांका की ज़मीन से दिया था – हिंदू-मुस्लिम एकता का अमिट मंत्र।”
प्रो. उमेश नीरज ने गांधी के आगमन स्थलों पर हुए अवलोकन को “मानवता के विराट रूप” से जोड़ते हुए आइंस्टीन का वह प्रसिद्ध उद्धरण दोहराया:
“आने वाली पीढ़ियां शायद ही विश्वास करेंगी कि ऐसा कोई व्यक्ति इस धरती पर चला था।”
विचारों की इस श्रृंखला में जब श्री सुधांशु शेखर ने कविता के माध्यम से अपनी पीड़ा प्रकट की, तो हर चेहरा गंभीर हो उठा – गांधी का सपनों का भारत
साथ उन्हीं के साथ गुजर गया… यह कविता न सिर्फ एक भावनात्मक क्षण थी, बल्कि एक आत्ममंथन भी – क्या हम सच में गांधी के भारत को बचा पाए हैं?
इसके बाद गांधी चौक के अलावा समुखिया मोड़ स्थित सर्वोदय महाविद्यालय और अमरपुर प्रखंड के बल्लीकित्ता गांव में भी गांधी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण हुआ। बल्लीकित्ता गांव की खास बात यह रही कि वहां बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाएं और बच्चे शामिल हुए – गांधी के “ग्राम स्वराज” के सपने को जीवित रखते हुए।
अंत में कारवां पहुंचा शोभनपुर स्थित गांधी आश्रम – वही जगह, जहां गांधी ने एक रात बिताई थी। आज वहां उनके विचारों ने रात नहीं बिताई, बल्कि एक नई सुबह की शुरुआत की।शताब्दी वर्ष का यह आयोजन महज एक स्मरण नहीं था, यह गांधी को फिर से जीने की कोशिश थी। और शायद एक संदेश भी – अगर गांव बचे, तो गांधी बचेंगे। और गांधी बचेंगे, तभी यह देश बचेगा।

