न गुंबद, न छत… पीपल के पेड़ के नीचे खुद प्रकट हुए शिवलिंग! झारखंड का दूसरा बाबाधाम है बाबा अमरेश्वर धाम

खूंटी : आमतौर पर मंदिर का नाम सुनते ही आंखों के सामने भव्य शिखर, गुंबद और घंटियों से सजा मंदिर दिखाई देता है। लेकिन झारखंड में एक ऐसा शिवधाम भी है, जहां न कोई गुंबद है, न शिवलिंग के ऊपर छत। यहां भगवान शिव खुले आसमान के नीचे पीपल के पेड़ की छांव में विराजमान हैं। खूंटी जिले के अंगराबाड़ी स्थित बाबा अमरेश्वर धाम को इसी अनोखी मान्यता और आस्था के कारण झारखंड का दूसरा बाबाधाम कहा जाता है।
सावन आते ही इस धाम का नजारा बदल जाता है। सुबह से ही दूर-दूर तक भक्तों की कतार नजर आती है। कोई कांवर लेकर पहुंचता है तो कोई मन्नत पूरी होने पर बाबा के दरबार में जल चढ़ाने आता है। खास बात यह है कि यहां श्रद्धालु सीधे शिवलिंग पर जल अर्पित कर सकते हैं। यही वजह है कि झारखंड के अलावा ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार और पश्चिम बंगाल से भी बड़ी संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, बाबा अमरेश्वर धाम का शिवलिंग किसी ने स्थापित नहीं किया, बल्कि पीपल के पेड़ के बीच स्वयं प्रकट हुआ। आसपास रहने वाले जनजातीय समुदाय के लोग काफी पहले से यहां पूजा-अर्चना करते आ रहे थे। धीरे-धीरे इस स्थान की चर्चा दूर तक फैलने लगी और श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई।
आज भी शिवलिंग उसी पीपल के पेड़ के नीचे खुले आसमान में विराजमान है। मंदिर समिति ने पेड़ और शिवलिंग के चारों ओर चहारदीवारी जरूर बनवाई है, लेकिन शिवलिंग के ऊपर छत नहीं है।
बाबा अमरेश्वर धाम से जुड़ी एक कहानी भी बेहद दिलचस्प है। बताया जाता है कि आर. साहू की रांची से सिमडेगा के बीच बस चलती थी। उनकी बस अक्सर इसी स्थान के आसपास आकर खराब हो जाती थी। बार-बार एक ही जगह बस खराब होने से वह हैरान थे।
एक दिन आर. साहू खुद बस से उतरे और यह जानने के लिए आसपास देखने लगे कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। इसी दौरान उनकी नजर इस स्थान पर पड़ी और उन्हें शिवलिंग के दर्शन हुए। इसके बाद उन्होंने इस स्थान को मंदिर का रूप देने का प्रयास शुरू किया।
लेकिन यहां भी एक रहस्य सामने आया। शिवलिंग के ऊपर छत डालने की जब भी कोशिश हुई, किसी न किसी कारण से काम रुक गया। कई प्रयासों के बाद भी छत नहीं बन सकी। आज भी बाबा खुले आसमान के नीचे ही विराजमान हैं।
मंदिर समिति के महामंत्री मनोज जायसवाल के अनुसार, वर्ष 1989 में जगद्गुरु स्वामी स्वरूपानंद यहां पहुंचे थे। ध्यान साधना पूरी करने के बाद उन्होंने समिति के सदस्यों को बुलाया और इस स्थान का नाम बाबा अमरेश्वर धाम रखने की बात कही। इसके बाद अंगराबाड़ी का यह शिवधाम बाबा अमरेश्वर धाम के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
सावन में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि जिला प्रशासन को विशेष व्यवस्था करनी पड़ती है। मंदिर परिसर के आसपास करीब एक महीने तक मेला भी लगता है। जलाभिषेक के लिए घंटों कतार में खड़े भक्तों का कहना है कि बाबा अमरेश्वर धाम में अद्भुत शक्ति है और सच्चे मन से मांगी गई मुराद यहां पूरी होती है।
यही विश्वास हर साल हजारों श्रद्धालुओं को इस धाम तक खींच लाता है। जहां एक ओर देवघर का बाबाधाम भव्यता के लिए प्रसिद्ध है, वहीं बाबा अमरेश्वर धाम अपनी सादगी, रहस्य और खुले आसमान के नीचे विराजमान शिवलिंग के लिए श्रद्धालुओं के बीच खास पहचान रखता है।

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