तीनों विधायक – गोपाल, पवन और ललन – पहले से समझ चुके थे संकेत: ‘ मेरा टिकट कटने ही वाला है, गणादेश’ ने तो फरवरी में ही ‘तीनों की छुट्टी होने’ की भविष्यवाणी कर दी थी
गणादेश,भागलपुर। जिले के दो भाजपा विधायक और एक जेडीयू विधायक को पहले से ही अंदाज़ा था कि उन्हें बेटिकट किया जाएगा, यानी टिकट कटना तय है। पार्टी स्तर पर इसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी। संगठन की गहरी निगरानी और बैठकों के बीच यह पूरा प्लान धीरे-धीरे आकार ले रहा था। इतना ही नहीं, ‘गणादेश’ ने तो फरवरी में ही ‘तीनों की छुट्टी होने’ की भविष्यवाणी कर दी थी। पार्टी में तरजीह नहीं मिलने पर एनडीए के तीन विधायक बगावती तेवर अपना सकते हैं।
जेडीयू विधायक गोपाल मंडल अपनी तीखी बयानबाजी और विवादित हरकतों के कारण लंबे समय से सुर्खियों में थे। लेकिन मामला इस चुनावी वर्ष में तब भड़का जब उन्होंने सांसद अजय मंडल की मुंहबोली भांजी, जो जेडीयू नेत्री भी थी, पर सार्वजनिक रूप से अमर्यादित टिप्पणी कर दी। सांसद तक को अपशब्द कहने के बाद पार्टी में भूचाल सा आ गया। सांसद और उनकी भांजी ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर शांत लहजे में प्रतिक्रिया दी और निर्णय हाईकमान पर छोड़ दिया। इससे गोपाल मंडल की टिकट-यात्रा का अंतिम अध्याय लगभग तय हो गया। इधर गोपाल को भी इसका एहसास होने लगा था, इसलिए टिकट बचाने की कोशिश में उन्होंने आरजेडी खेमे तक दस्तक दी। लेकिन इस चुनावी वर्ष में वहां से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली और वे बैरंग लौटा दिए गए। उधर, बुलो मंडल को सांसद ललन सिंह गोपालपुर से चुनाव लड़ाने की बात लगभग पक्की कर चुके थे।
पीरपैंती के भाजपा विधायक ललन पासवान का बेटिकट होना राजनीतिक गलियारों में किसी को चौंकाने वाला नहीं था। वजह भी सबको पता थी – भाजपा की ‘फायर ब्रिगेड लॉबी’ से उनकी खुली जंग। इस लॉबी ने पीरपैंती में उनके खिलाफ जबरदस्त ‘भौकाल’ खड़ा किया और माना जाता है कि पार्टी की सात-स्तरीय सर्वे टीम भी इसी माहौल से प्रभावित हुई। यही नहीं, यह लॉबी पूर्व विधायक अमन पासवान को टिकट दिलाने के लिए पटना से दिल्ली तक जोरदार लॉबिंग में जुटी रही, जो अंततः असफल साबित हुई। ऊपर से विधायक का ‘रॉबिनहुड अवतार’ – बंदूक झुलाते और कमर में रिवॉल्वर लगाए वीडियो ने अलग ही सुर्खियां बटोरीं।
इन सभी कारणों ने मिलकर उनकी टिकट की लाइट पूरी तरह गुल कर दी।
कहलगांव के भाजपा विधायक पवन यादव को भी पिछले एक वर्ष से एहसास था कि मामला बिगड़ रहा है। नीतीश सरकार के बहुमत परीक्षण के दौरान आखिरी समय में विधानसभा पहुंचने और फिर आरजेडी की ‘खेला होवे’ रणनीति में उनका नाम उछलना।ये दोनों घटनाएं भाजपा नेतृत्व की नज़र से बच नहीं सकीं। बाद में यह चर्चा भी रही कि किसी पार्टी से टिकट पाने की कोशिश में पवन यादव रात के अंधेरे में आरजेडी नेताओं से मिलने तक जा रहे थे। पिछले एक वर्ष से पवन का अल्पसंख्यक प्रेम भी उमड – घुमड रहा था। जो भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को नागवार गुजर रहा था। पार्टी इन दोनों विधायकों (पवन और ललन) पर पैनी नज़र रख रही थी वज़ह ‘खेला’ प्रकरण में दोनों के नाम की चर्चा आम थी।बताया जाता है कि इस भय के बाद पवन ने टिकट पाने की अंतिम कोशिशें जारी रखीं। सीट-बंटवारे के समय ऐसा लगा भी कि उनकी बात बन चुकी है। लेकिन अंतिम रात मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी खास टीम की पैनी नज़र ने पासा पलट दिया और यह सीट भाजपा से निकलकर जेडीयू यानी नीतीश कुमार के खाते में चली गई। कहते हैं, दो केंद्रीय मंत्रियों ने पवन को बेटिकट न होने का ‘ठेका’ ले रखा था, लेकिन मामला नहीं बन पाया। इस खेला को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने टिकट शेयरिंग की घोषणा के दूसरे दिन धर दबोचा और जेडीयू के दो बड़े चेहरे को खूब खरी खोटी सुनाई। वैसे इस सीट को लेकर जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने तारापुर सीट से अदला-बदली कही। जो राजनीतिक पंडितों के गले कभी नहीं उतर पाया। वैसे राजनीतिक पंडित बताते हैं कि पवन के टिकट कटने की पटकथा तभी लिखी जा चुकी थी जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्व सदानंद सिंह के श्राद्ध कर्म में आए। निधन के बाद शुभानंद को जेडीयू में शामिल कराया गया। चुनाव की तारीख की घोषणा से ठीक पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का शुभानंद के पैतृक गांव जाकर उनके पिता स्व. सदानंद सिंह की प्रतिमा का अनावरण करना – यह संकेत और पुख्ता कर गया कि कहलगांव में नया समीकरण तैयार हो चुका है और यहां से जेडीयू के चेहरे के रूप में शुभानंद ही चुनाव मैदान में रहेंगे।



