तेजप्रताप दलित बस्तियों में यात्रा कर रहे, पर बैनर राजद का नहीं
गणादेश ब्यूरो
पटना: तेजप्रताप यादव फिर राजद के बैनर छोड़कर दलित बस्तियों की यात्रा पर निकल पड़े हैं। मजदूर दिवस के मौके पर वह नए बैनर के तले दलित बस्तियों में कपड़े बांट रहे हैं।
वह लालू प्रसाद की राजनीति की चर्चा करते हैं और केंद्र सरकार को कोसते हैं। कोई पार्टी विरोधी लाइन नहीं लेते। फिर राजद का बैनर क्यों नहीं।
बिहटा की सभा में मौजूद एक शख्स कहता है कि इस पर भी विवाद खड़े होंगे क्या ! पर तेजप्रताप को इन बातों की परवाह नहीं है।
पटना महानगर युवा के अध्यक्ष रामराज यादव की कथित पिटाई से उपजा विवाद अंदर ही अंदर बड़ा रूप लेता जा रहा है। पार्टी के कई नेता कहते हैं कि
तेज प्रताप यादव ने बार-बार पार्टी के अनुशासन को तार-तार किया है। उपचुनाव में अपना उम्मीदवार तक खड़ा किया।प्रदेश अध्यक्ष को बुरा भला कहा। तेजस्वी के आसपास रहने वालों को हमेशा निशाने पर रखा। प्रकारांतर से तेजप्रताप यादव यही सिद्ध करना चाहते हैं कि वह अपने हिसाब से पार्टी चलाना चाहते हैं।
भले ही तेज प्रताप यादव राजद में किसी पद पर नहीं हैं।एक सामान्य विधायक हैं, पर लालू प्रसाद के बड़े पुत्र होने के चलते राजद का कोई बड़ा पदाधिकारी भी उनके खिलाफ सार्वजनिक टिप्पणी करने से बचता है। इसी वजह से बहुत सारी बातें ऑफ द रिकॉर्ड होकर भी पब्लिक डोमेन में आ ही जा रही है और पार्टी अनुशासन की धज्जियां उड़ा रही हैं।
अब तेजप्रताप की वजह से बातें जिस स्तर पर बिगड़ चुकी है, उसमें लालू प्रसाद को हर हाल में हस्तक्षेप करना ही होगा। वह इस जिम्मेवारी से बच नहीं सकते।उन्हें देर सबेर तय करना होगा कि आरजेडी कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव के हिसाब से चलेगी या फिर तेजप्रताप की मनमानी से।
राजद के कई बड़े नेता ऑफ द रिकॉर्ड बताते हैं कि तेजप्रताप को परिवार के ही कुछ सदस्यों द्वारा चढ़ाया बढ़ाया जाता है।ऐसे में यह संकट आने वाले दिनों में कोई बड़ा रूप ले सकता है। क्षेत्रीय और पारिवारिक पार्टियों के साथ यही दिक्कत भी है, क्योंकि यहां पॉवर डिस्ट्रीब्यूशन भी परिवार के बीच ही होना है।
कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी पर भी अक्सर यह आरोप लगता है कि पुत्रमोह में उन्होंने पार्टी का क्षरण होने दिया है। कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को लगता है कि अगर सोनिया गांधी ने शुरू से राहुल की जगह प्रियंका को तरजीह दी होती है तो आज पार्टी की स्थिति ऐसी नहीं होती। मुलायम परिवार की कहानी तो सर्वविदित है। अगर अखिलेश यादव ने कड़ा रुख अपनाते हुए पार्टी पर पूर्ण नियंत्रण नहीं किया होता तो आज समाजवादी पार्टी भी सियासी तौर पर टुकड़ा टुकड़ा गैंग हो जाती। सियासी इतिहास के ऐसे उदाहरण यह बताने के लिए काफी हैं कि योग्य व्यक्ति को अगर अगर संगठन की कमान समय से नहीं सौंपी गई तो न संगठन रहेगा और ना ही समीकरण, क्योंकि समीकरण तो संगठन के हिसाब से बनते बिगड़ते हैं।
तेजस्वी ने बोचहां उपचुनाव और विधान परिषद चुनावों में जिस तरह ए टू जेड समीकरण को विस्तार दिया। जिस तरह सवर्णों को पार्टी से जोड़ा।उसने राजद के माय समीकरण का बड़ा विस्तार कर बीजेपी को भी बैकफुट पर आने को विवश कर दिया। यह युवा तेजस्वी की चालाकी भरी सियासी चाल थी,जिसमें वह सफल होते दिख रहे हैं।
ऐसे में लालू प्रसाद के सामने स्पष्ट फैसले लेने का प्रेशर होगा। राजनीति के मास्टरमाइंड लालू प्रसाद ने जितने संघर्ष से पार्टी खड़ी की है, उसे वह निश्चित रूप से प्रासंगिक और सत्ताधारी बनाना चाहेंगे। पर उन्हें बीमारी की सर्जरी तो करनी पड़ेगी। क्योंकि अब घाव पर मलहम लगाने का वक़्त नहीं है।

