सस्पेंस खत्म, पर्दा उठा, टिकट बंटा, भागलपुर में रिपीट चेहरा, कहलगांव से ‘सिटिंग’ का पत्ता साफ

प्रदीप विद्रोही,भागलपुर : पिछले कुछ दिनों से जिले की दो सबसे चर्चित विधानसभा सीटों – भागलपुर सदर और कहलगांव पर प्रत्याशियों को लेकर चल रहा हाई वोल्टेज सस्पेंस मंगलवार को आखिरकार खत्म हो गया। दिन भर राजनीतिक हलचलों, संभावनाओं और दावों के बीच एनडीए के पत्ते जब खुले, तो किसी का दिल धड़क गया और किसी की धड़कनें थम सी गईं।सांसें थमीं, निगाहें टिकी रहीं

सुबह से ही एक्स (पूर्व ट्विटर), फेसबुक और वाट्सऐप ग्रुप्स पर समर्थकों की गतिविधियां तेज थीं। कोई कह रहा था, “रिपीट ही जीत की गारंटी है”, तो कोई पलटवार करता – “फ्रेश फेस से ही फतह मुमकिन है!” हर गली, नुक्कड़ में अटकलों की हवा गर्म थी। समर्थक न सिर्फ उम्मीद पाले बैठे थे, बल्कि अपनी-अपनी जीत तय मानकर पोस्टर-बैनर तक डिजाइन करा चुके थे।

दोपहर की धूप के साथ जब दिल्ली दरबार से आधिकारिक सूची आई, तो राजनीतिक कोहरा छंट गया। भागलपुर सदर से भाजपा ने एक बार फिर रोहित पांडे पर भरोसा जताया, यानी पार्टी ने रिपीट कार्ड खेला। वहीं कहलगांव सीट एनडीए के फार्मूले के तहत जदयू के खाते में गई और वहां से ई. शुभानंद मुकेश को टिकट थमा दी गई।

सुबह तक जो एक्स पर “वापसी तय है” जैसे हैशटैग चला रहे थे, उनमें से एक खेमा दोपहर होते-होते खामोश हो गया। वहीं दूसरी ओर, मुकेश समर्थकों के लिए यह घड़ी जश्न की बन गई। पटाखों की आवाज़ से फिजा गूंज उठी, मिठाइयां बंटी और सोशल मीडिया पर ‘वी हैव वोन’ जैसे कैप्शन के साथ बधाई पोस्ट्स की बाढ़ आ गई।

वहीं, जिनका टिकट कट गया, उनके समर्थक अवसाद की स्थिति में दिखाई दिए। किसी ने पार्टी की आलोचना शुरू की, तो किसी ने ‘अभी तो शुरुआत है’ कहकर भविष्य की लड़ाई का संकेत दिया।

सबसे चौंकाने वाला फैसला रहा कहलगांव से भाजपा के सिटिंग विधायक पवन कुमार यादव का टिकट काटा जाना। यह फैसला समर्थकों के लिए झटका लेकर आया। दरअसल, पिछले दो हफ्तों से पवन समर्थक सोशल मीडिया पर आक्रामक प्रचार कर रहे थे। बड़े-बड़े स्थानीय पन्नों से लेकर व्यक्तिगत प्रोफाइल तक पर “पुनः पवन” जैसे नारे ट्रेंड में थे। प्रचार इतना आत्मविश्वास से लबरेज था कि विपक्षी खेमे को भी कभी-कभी अपने दावों पर संदेह होने लगा था। लेकिन जब सूची में नाम नहीं दिखा, तो न सिर्फ समर्थकों की उम्मीदें चूर हुईं, बल्कि टिकट पक्के मानकर तैयार बैठे कई स्थानीय कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूटा।

जेडीयू में जीत की दस्तक, संगठन में नई ऊर्जा

उधर, जेडीयू खेमे में जैसे ही शुभानंद मुकेश के नाम की पुष्टि हुई, संगठन में नई जान आ गई। मालूम हो कि शुभानंद कांग्रेस के हैवीवेट विधायक स्व सदानंद सिंह के सुपुत्र हैं। मुकेश पिछला विधान सभा चुनाव कांग्रेस के टिकट से लडे थे और भाजपा के पवन यादव से हार बैठे थे। पिता के निधन के बाद मुकेश कांग्रेस को छोड़कर जेडीयू में शामिल हो गए। जेडीयू ने भी मुकेश को पार्टी की मजबूती के लिए प्रदेश भर में पार्टी अभियान में लगाया। पार्टी सूत्रों की मानें तो मुकेश लंबे समय से जमीन पर सक्रिय थे और उन्होंने स्थानीय मुद्दों को लेकर जन संवाद को प्राथमिकता दी थी। जमीनी पकड़ और साफ छवि उनके पक्ष में गई। इसी बीच हाल ही में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी, जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा की एक बड़ी सभा सदानंद सिंह के पैतृक गांव धुवावे में हुई। इस दौरान स्व सदानंद सिंह की प्रतिमा का अनावरण भी हुआ। कुलमिलाकर, इस परिदृश्य के समय ही यह स्पष्ट हो चुका था कि अब यह सीट जदयू के खाते में चली गई। अंततः यह अंदेशा आज सत्य साबित हुआ।

अब जब टिकट बंट चुके हैं, तो असली लड़ाई का शंखनाद हो चुका है। क्योंकि अंततः वही तय करेगा कि ‘दोहराया हुआ भरोसा’ भारी पड़ता है या ‘ताजा चेहरा’ जनता का दिल जीत लेता है।

राजनीति में कोई सीट हमेशा के लिए पक्की नहीं होती। न कोई चेहरा स्थायी विजेता। हर बार जनता नई कसौटी पर परखती है और इसी कसौटी के मैदान में अब ये उम्मीदवार उतरने को तैयार हैं।

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