आदिवासी हुंकार रैली में अपमान से भड़कीं निशा भगत,बोलीं, “यह रैली नहीं, आदिवासी अस्मिता पर हमला था, ईसाई मिशनरी फंडिंग और राजनीतिक साज़िश का लगाया आरोप
गणादेश,रांची: प्रभात तारा मैदान में हुई आदिवासी हुंकार रैली अब राजनीतिक भूचाल का कारण बन गई है। रैली के दौरान केंद्रीय सरना समिति की महिला अध्यक्ष निशा भगत को मंच से धक्का देकर उतारे जाने की घटना ने पूरे आदिवासी समाज में आक्रोश फैला दिया है। शनिवार को रांची के कचहरी चौक स्थित सरना समिति कार्यालय में प्रेस कांफ्रेंस करते हुए निशा भगत ने तीखे शब्दों में कहा — “यह रैली आदिवासी अस्मिता की रक्षा नहीं, बल्कि उस पर सुनियोजित हमला था।”
निशा भगत ने खुलकर आरोप लगाया कि रैली में असली आदिवासियों की जगह धर्मांतरित ईसाई और फर्जी आदिवासी तत्वों ने कब्जा कर लिया था। उन्होंने कहा कि मंच पर जो लोग थे, वे मिशनरियों के एजेंडे पर काम कर रहे थे। “हमारे देवी-देवताओं को ‘भूत-प्रेत’ कहकर अपमानित किया गया। यह किसी धर्म का विरोध नहीं, बल्कि आदिवासी आस्था का अपमान है,” उन्होंने कहा।
केंद्रीय सरना समिति अध्यक्ष ने खुलासा किया कि रैली का मंच ईसाई मिशनरी फंड से तैयार किया गया था और इसका मकसद कुड़मी समाज के एसटी दर्जा विरोध के मुद्दे को राजनीतिक रंग देना था। उन्होंने कहा — “धर्मांतरित विधायक अब आदिवासी आरक्षण पर कब्जा कर रहे हैं। झारखंड की 28 आरक्षित सीटों में से 10 पर धर्मांतरित लोग बैठे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर मिशनरियों ने व्यापार खड़ा किया है। उनकी नीति साफ है — ‘ईसाई बनो, और आरक्षण लूटो।’”
इस मौके पर फूलचंद तिर्की ने भी निशा भगत का समर्थन करते हुए कहा कि केंद्रीय सरना समिति सिर्फ उन्हीं लोगों की है जो मूल आदिवासी परंपराओं और सरना धर्म में आस्था रखते हैं। उन्होंने आदिवासी नेताओं को चेताया — “समाज का आंदोलन मिशनरियों के पैसों से नहीं, हमारे खून-पसीने से चलना चाहिए। जो अपने धर्म से भटक गया, वह आदिवासियों का प्रतिनिधि नहीं हो सकता।”
प्रभात तारा मैदान की यह घटना अब आदिवासी समाज बनाम मिशनरी प्रभाव की नई बहस को जन्म दे चुकी है। सरना समाज ने इसे “काला दिवस” घोषित करते हुए राज्यव्यापी विरोध की चेतावनी दी है।



