किस्मत की पर्ची ने बदली सियासत की तस्वीर,लॉटरी से तय हुआ जिला परिषद का मुखिया
भागलपुर। हरी अनंत हरी कथा अनंता… कहते हैं न राजनीति में मेहनत, जोड़-तोड़, पूजा-पाठ और रणनीति सब अपनी जगह है, लेकिन आख़िरी चाल कभी-कभी किस्मत चलती है। भागलपुर जिला परिषद अध्यक्ष के चुनाव में भी कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला। तमाम कयास, गणित और दावे उस वक्त धराशायी हो गए, जब अध्यक्ष की कुर्सी का फैसला मतपेटी नहीं, बल्कि लॉटरी की पर्ची से हुआ।
चुनावी रण में आमने-सामने थे विपिन मंडल और अनंत कुमार उर्फ टुनटुन साह। दोनों खेमों ने जीत के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया। समर्थकों की भागदौड़, बैठकों का दौर, यात्राएं और राजनीतिक जोड़-तोड़ – सब कुछ आज़माया गया। टुनटुन का जुगाड़ बीस था लेकिन अंत में उन्नीस साबित हुआ।
टुनटुन ने अपने समर्थकों को बिहार, बंगाल, झारखंड और उड़ीसा तक की सैर कराया, खूब खर्च भी हुआ, बाबा बासुकी और बाबा बैद्यनाथ के दरबार में मन्नतें भी मांगी गईं। वहीं विपिन गुपचुप यानी भूमिगत रणनीति बनाने में जुटे रहे। और अंततः तीर निशाने पर बैठा। जब मतगणना पूरी हुई, तो सियासी पंडितों की सारी गणनाएं बराबरी पर आकर अटक गईं। मतदान में दोनों प्रत्याशियों को 15-15 वोट मिले। न कोई आगे, न कोई पीछे। हालात ऐसे बने कि निर्वाचन नियमों के मुताबिक लॉटरी का सहारा लेना पड़ा। सभागार में सन्नाटा था, धड़कनें तेज़ थीं और निगाहें उस पर्ची पर टिकी थीं, जो भागलपुर के नए नेतृत्व का फैसला करने वाली थी।
जैसे ही लॉटरी खुली, नाम सामने आया – विपिन मंडल। एक पल में तस्वीर बदल गई। समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी, तालियों और नारों से माहौल गूंज उठा। वहीं दूसरी ओर, हार का कारण न वोटों की कमी था और न रणनीति की चूक, बल्कि सिर्फ़ किस्मत का पलड़ा।
नवनिर्वाचित जिला परिषद अध्यक्ष विपिन मंडल को बधाई देने पूर्व जिप अध्यक्ष मौजूदा नाथनगर विधायक मिथुन यादव भी पहुंचे। विजयी माल पहनने के बाद नव निर्वाचित जिप अध्यक्ष विपिन मंडल ने संयमित अंदाज़ में प्रतिक्रिया दी। उन्होंने जिला परिषद सदस्यों और जनता का आभार जताते हुए कहा कि यह पद उनके लिए सम्मान के साथ बड़ी ज़िम्मेदारी भी है। वे सभी सदस्यों को साथ लेकर भागलपुर के विकास, पंचायतों को मज़बूत करने और जनकल्याणकारी योजनाओं को ज़मीन पर उतारने के लिए ईमानदारी से काम करेंगे।
यह चुनाव परिणाम अब भागलपुर जिला परिषद के इतिहास में दूसरी बार रोचक और यादगार अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। जहां सत्ता का ताज न जोड़ – तोड़ से तय हुआ, न बहुमत से, बल्कि किस्मत की एक पर्ची ने नया अध्यक्ष चुन लिया।



