सरकार चल रही है या गठबंधन की गाड़ी अटक रही है?
रांची: झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली इंडिया गठबंधन सरकार के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं दिख रहा है। बीते कुछ महीनों की राजनीतिक घटनाओं पर नजर डालें तो सहयोगी दलों के बीच लगातार बढ़ती असहजता और मतभेद सत्ता के गलियारों में चर्चा का विषय बने हुए हैं। हालांकि सरकार स्थिर है, लेकिन गठबंधन के भीतर खींचतान के संकेत समय-समय पर खुलकर सामने आते रहे हैं।
गठबंधन में मतभेद की शुरुआत बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान सीटों के बंटवारे को लेकर हुई, जब झामुमो और राजद के बीच असहमति उभरकर सामने आई। उस समय कांग्रेस की भूमिका भी सहयोगी दलों को संतुष्ट करने वाली नहीं मानी गई। इसके बाद असम विधानसभा चुनाव में झामुमो ने कांग्रेस से अलग राह चुनते हुए 19 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे विपक्षी एकजुटता का संदेश कमजोर हुआ।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी झामुमो ने कांग्रेस के बजाय ममता बनर्जी का खुलकर समर्थन किया। जबकि कांग्रेस स्वयं चुनाव मैदान में थी। इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि गठबंधन के भीतर राजनीतिक प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं।
हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव ने इन मतभेदों को और अधिक उजागर कर दिया। गठबंधन के स्तर पर एक सीट झामुमो और एक सीट कांग्रेस के खाते में जाने की चर्चा थी, लेकिन झामुमो ने दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी शुरू कर दी। जवाब में कांग्रेस ने भी अंतिम सहमति का इंतजार किए बिना अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दलित चेहरे के रूप में बैद्यनाथ राम को उम्मीदवार बनाया, जबकि निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी भी जीत दर्ज करने में सफल रहे।
राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की हार के बाद पार्टी ने अपने सहयोगी दल राजद और भाकपा (माले) पर अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने का आरोप लगाया। हालांकि कुछ दिनों तक चले इस राजनीतिक विवाद के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने गठबंधन को बनाए रखने की प्रतिबद्धता जताते हुए विवाद को शांत करने की कोशिश की।
अब कांग्रेस कोटे से वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर की नाराजगी ने गठबंधन की राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने अपनी सुरक्षा में तैनात सभी सुरक्षाकर्मियों और कारकेड को वापस कर दिया है। मंत्री का कहना है कि उन्होंने डीजीपी से अतिरिक्त सुरक्षा की मांग की थी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिलने पर उन्होंने यह कदम उठाया। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से कोई नाराजगी नहीं है। इसके बावजूद राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को सामान्य प्रशासनिक मुद्दे से अधिक राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि झामुमो आने वाले समय में अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता को और मजबूत करने की रणनीति पर काम कर सकता है। यह चर्चा भी तेज है कि पार्टी भविष्य में ओडिशा के नवीन पटनायक की तरह ऐसी राजनीतिक राह अपनाने की कोशिश कर सकती है, जिसमें वह कांग्रेस और भाजपा—दोनों से समान दूरी बनाकर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करे। हालांकि इस संबंध में झामुमो की ओर से कोई आधिकारिक संकेत या घोषणा नहीं की गई है।
फिलहाल सरकार पर किसी तात्कालिक संकट के संकेत नहीं हैं, लेकिन गठबंधन के भीतर लगातार सामने आ रही असहमतियां यह जरूर बताती हैं कि सहयोगी दलों के रिश्तों में पहले जैसी सहजता नहीं रह गई है।


