न मुझे, न शाहनवाज़ को लड़ना है चुनाव; अर्जित का फैसला आलाकमान करेगा, पुत्र मोह से अब भी बाहर नहीं निकल पा रहे चौबे
भागलपुर। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता अश्विनी कुमार चौबे अब भी पुत्र मोह से बाहर नहीं निकल पाए हैं। जिला परिसदन में आयोजित एक प्रेस वार्ता में उन्होंने साफ़ किया कि भागलपुर विधानसभा सीट को लेकर लगाए जा रहे तमाम कयासों के बीच वह न तो स्वयं चुनाव लड़ेंगे, और न ही भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज़ हुसैन चुनाव मैदान में उतरेंगे। उन्होंने कहा, “हम दोनों जीवन भर पार्टी और संगठन के लिए काम करते रहेंगे।” उन्होंने आगे कहा कि इसका निर्णय पार्टी का आलाकमान करेगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि वे भागलपुर जिले के सभी विधानसभा क्षेत्रों और प्रखंडों का दौरा करेंगे।
चौबे के इस बयान के बाद अब शेष बचे दावेदारों के चेहरों पर रौनक लौट आई है। कई लोग कहने लगे हैं कि चलो, “हैवीवेट” दो चेहरे तो अब मैदान से हट गए। अब रास्ता कुछ साफ़ होता दिख रहा है।
गौरतलब है कि भागलपुर सीट से चुनाव लड़ने के इच्छुक नेताओं की कतार अब भी लंबी है। हर उम्मीदवार अपनी-अपनी ‘डफली’ लेकर अपना ‘राग’ अलाप रहा है। लगभग आधा दर्जन चेहरे अब भी इस दौड़ में बने हुए हैं और सब के सब पटना व दिल्ली में बैठे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के आसपास अपनी “जुगाड़ गाड़ी” दौड़ा रहे हैं।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि उम्मीदवारों का चयन सात स्तरीय सर्वे रिपोर्ट के आधार पर किया जाएगा।
तीन सीटें, ढेरों दावेदार – अंदरूनी घमासान चरम पर
जिले की सात विधानसभा सीटों में से भाजपा के पास फिलहाल तीन सीटें हैं। लेकिन इन तीन सीटों को लेकर इस चुनावी वर्ष में जो सियासी संग्राम मचा है, वह “एक अनार, सौ बीमार”, “एक फूल, दर्जन भर माली” और “ढेरों जोगी, मठ उजाड़” जैसी कहावतों को भी पीछे छोड़ता दिख रहा है।
भागलपुर सदर सीट, जो भाजपा की सबसे प्रतिष्ठित सीट मानी जाती है, वहां लगातार हार के बावजूद पार्टी अब तक एकजुट नहीं हो पाई है। आधा दर्जन से अधिक चेहरे भीतरघात और जोड़तोड़ में सक्रिय हैं। संगठन की एकता का दिखावा केवल मीटिंगों और सोशल मीडिया (एक्स) तक सीमित रह गया है। अंदरखाने तो हर कोई एक-दूसरे की “कमीज़ फाड़ने” को तैयार बैठा है। चौधरी जी, चौबे जी और पांडे जी की हार के बाद पार्टी अब एक सर्वमान्य और नया चेहरा खोजने में लगी है। लेकिन “हारे को हरिनाम” की तर्ज़ पर कुछ पुराने खिलाड़ी अपनी टेढ़ी चालों से अब भी बाज़ नहीं आ रहे। यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो इस बार भी अजीत शर्मा की जीत को रोक पाना मुश्किल होगा।
अन्य सीटों पर भी उबाल
कहलगांव, बिहपुर और पीरपैंती जैसी सीटों पर टिकट की उम्मीद दिखाकर कई नेताओं को दौड़ में झोंक दिया गया है। गंगा पार, एक धनबल-सम्पन्न उम्मीदवार को एक तयशुदा चेहरे को रोकने के लिए मैदान में उतारा गया है, जो संभवतः जीत से ज़्यादा हार का कारण बन सकता है। भाजपा के भीतर टिकट न मिलने की स्थिति में इन नेताओं को अन्य दलों में “भाग्य आज़माने” की सलाह भी दी जा रही है। इससे भाजपा अपने ही घर में “आग” लगाने पर आमादा नज़र आ रही है।
गुटबाज़ी और भौकाल का खेल
जिले की भाजपा-शासित हर सीट पर हालत कुछ ऐसी है, जैसे “कन्हैया नचावें, नाचें ग्वाल-बाल और गोपियां।” मठाधीश नेता जिले की राजनीति को अपनी-अपनी शर्तों पर नचा रहे हैं। अपने प्यादों को सियासी खेल में उतारा जा चुका है। वे कभी अचानक “प्रकट” हो जाते हैं, तो कभी “भौकाल मचाकर” ग़ायब हो जाते हैं।
दावेदारों की कतार लंबी है, लेकिन ठोस रणनीति और समन्वय का पूरी तरह से अभाव है। शीर्ष नेतृत्व के निर्देशों से ज़्यादा, स्थानीय क्षत्रपों की “भौकाल राजनीति” ने संगठन की दिशा भटका दी है।
जब इन नेताओं के सपने चकनाचूर होंगे, तब सबसे ज़्यादा नुकसान भागलपुर सीट को ही उठाना पड़ेगा – जहां एक जीत के लिए भाजपा सालों से तरस रही है।
कहलगांव, बिहपुर, पीरपैंती: हालात गंभीर
कहलगांव में भाजपा विधायक के खिलाफ तीन भाजपाई चेहरे खुलकर दावेदारी पेश कर रहे हैं, और सभी शीर्ष नेतृत्व का हवाला दे रहे हैं। वहीं, पार्टी के कुछ नेता क्षेत्र भ्रमण के दौरान आम जनता में विधायक के प्रति नाराज़गी को भी खुलकर सामने ला रहे हैं।
पीरपैंती में विधायक ललन के “गुलशन” में कई “फूल” खिलने को बेताब हैं। यहां कार्यकर्ता लंबे समय से अमन-चैन की तलाश में हैं। गांव-गांव घूम रहे कई स्थानीय व बाहरी चेहरे खुद को भाजपा का भविष्य बता रहे हैं।
संगठन में समन्वय नहीं, कार्यकर्ता असमंजस में
भाजपा में अब सामूहिक नेतृत्व की कमी, गुटबाज़ी और अंतर्कलह केवल चर्चा नहीं रह गई है – यह ज़मीनी हक़ीक़त बन चुकी है। कार्यकर्ता असमंजस में हैं और मतदाता खुद को ठगा-सा महसूस कर रहा है। आपसी प्रेम अब केवल मोबाइल स्क्रीन और सोशल मीडिया (एक्स) तक सीमित है।
भाजपा के लिए यह आत्ममंथन का समय है। क्या पार्टी भागलपुर में संगठन की आंतरिक खींचतान से ऊपर उठ पाएगी और मिशन 2025 की गंभीर तैयारी कर सकेगी? या फिर यह सियासी नृत्य केवल एक मंचीय तमाशा बनकर रह जाएगा?



