एनडीए का क्लीन स्वीप, मंत्रालय का सुखाड़: भागलपुर के सात विजेताओं में कौन पहुंचेगा मंत्रिमंडल के दरवाजे तक, कयास जारी

गणादेश,भागलपुर। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ने भागलपुर की राजनीति में ऐसा नया नक़्शा खींचा है, जैसा पिछले कई चुनावों में देखने को नहीं मिला था। जिले की सातों सीटों पर एनडीए ने झंडा फहरा दिया और वह भी एकतरफा प्रचंड जीत के साथ। तीन सीटें जेडीयू की झोली में, तीन पर भाजपा का कब्ज़ा, जबकि नाथनगर में लोजपा (आर) ने अपनी नई पहचान दर्ज की। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल- क्या इस बार भागलपुर को मिलेगा मंत्री पद का सुख या फिर एक बार फिर जिले को मिलेगा राजनीतिक उपेक्षा का वही पुराना ‘सुखाड़’। सवालों की झड़ी शुरू… भागलपुर के सात विजेताओं में कौन पहुंचेगा मंत्रिमंडल के दरवाजे तक, कयास जारी। सीट शेयरिंग में भी मुख्यमंत्री का शुभानंद के लिए अडना जग जाहिर है।

जिले के सातों विजेताओं में यदि किसी को ‘सबसे प्रभावी’ की उपाधि दी जाए तो वह निश्चित रूप से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खास, ‘लाडले’ विधायक ई. शुभानंद मुकेश हैं। टाटा स्टील में डीजीम जैसे बड़े पद को त्याग कर और पिता सदानंद सिंह के राजनीतिक सन्यास की घोषणा के बाद चुनाव मैदान में आने यानी राजनीतिक अनुभव, संगठन पर पकड़ और सीएम हाउस तक सीधी पहुंच – तीनों ही पहलू उन्हें संभावित मंत्री सूची में सबसे आगे खड़ा करते हैं। लेकिन बाकी छह चेहरों की उपलब्धियां और पिछला रिकॉर्ड। यही वह बिंदु है जहां समीकरण उलझते हैं। शुभानंद भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपना मानस पिता कहते नहीं थकते।

भाजपा के कुमार शैलेन्द्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यह कि उन्होंने लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की। एक स्थिर और मेहनतकश चेहरा। लेकिन मंत्रालय के लिए क्या पर्याप्त है। भाजपा की आंतरिक राजनीति में भागलपुर से एक चेहरे के मंत्री बनने की संभावना पर चर्चाएं तेज हैं, मगर शैलेन्द्र के लिए दायरे उतने खुले प्रतीत नहीं होते।

पिछले चुनाव में बेहद कम अंतर से हारने के बाद रोहित को टिकट तो मिल गया, पर यह सीट भाजपा के भीतर सबसे विवादित रही। आधा दर्जन दावेदार। नामांकन तक बगावत की बू।भीतरघात की आशंका। जिले भर में मतदान में फिसड्डी जो मतदान के बाद दिखा सुना भी गया। यही वजह रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो रैलियों, भाजपा के दर्जनभर मंत्रियों की कैंपेनिंग और स्थानीय क्षत्रपों की धौंस-पट्टी से जमीन पर परिस्थिति संभाली गई। स्पष्ट है – रोहित की जीत रोहित की छवि से अधिक संगठन यानी क्षत्रपों और ऊपरी नेतृत्व की रणनीति की जीत है।

पीरपैंती में भाजपा ने सिटिंग विधायक ललन पासवान को हटाकर संघ से जुड़े मुरारी पासवान को मैदान में उतारा। टिकट घोषित होते ही ‘भौकाल टीम’ नामक मजबूत स्थानीय गुट भी चौंक गया, मगर बाद में यही टीम मुरारी की जीत की सबसे बड़ी ताकत बनी। संघ की कैडर-ताकत, पार्टी नेतृत्व की आक्रामक रणनीति और भौकाल ग्रुप की ‘आसमानी’ कैंपेनिंग – तीनों ने मिलकर मुरारी को एकतरफा और विशाल जीत दिलाई।

सुल्तानगंज में प्रो. ललित का टिकट कटना लगभग तय था। वजह पांच वर्षों तक मतदाताओं से कटे रहना। और भी वजह। अंत भला तो सब भला। अंततः टिकट सिटिंग विधायक को ही जेडीयू ने दिया। महा-गठबंधन (आरजेडी/कांग्रेस) की फ्रेंडली फाइट ने उनके लिए रास्ते खुद ही साफ कर दिए। कमजोर विपक्षीय रणनीति का लाभ उन्हें सीधे सीधे मिला।

पिछले लोकसभा चुनाव में गोपालपुर ने सांसद अजय मंडल (जेडीयू) को रिकॉर्ड बढ़त दिलाई थी। बोले तो जिला टॉप। उसी रुझान ने इस बार बुलो मंडल को जीताया, हालांकि स्थानीय जनमानस में वह कभी भी ‘पसंदीदा’ चेहरा नहीं माने गए।असली मेहनत जेडीयू के जमीनी कार्यकर्ताओं ने की। पार्टी की लहर और जातीय समीकरण उनके लिए जीवनदायी साबित हुए। यहां भी त्रिकोणीय मुकाबले का फायदा बुलो को मिला।

नाथनगर सीट आरजेडी की सिटिंग सीट थी। इस बार नए चेहरे उतारने की रणनीति आरजेडी के लिए उलटी पड़ गई। लोजपा (आर) ने मिथुन यादव को टिकट देकर सीधे आरजेडी के ‘माई’ समीकरण को दो हिस्सों में बांट दिया। ऊपर से – चिराग पासवान की आक्रामक कैंपेनिंग, भाजपा की फुल-सपोर्ट और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की हाई-प्रोफाइल सभा। गोड्डा सांसद निशिकांत दुबे संग भोजपुरी स्टार निरुहुआ का रोड शो। इस रोड शो ने तो नाथनगर ही नहीं कहलगांव और पीरपैंती में भी अपना जलवा दिखाया। अंततः दो समुदाय की गोलबंदी ने नाथनगर में गुल खिलाया। इन सबने मिलकर मिथुन की जीत पक्की कर दी।

भागलपुर के सातों विधायक एनडीए के हैं, पर सभी की उपलब्धियां बराबर नहीं। जिले में चर्चा जोरों पर। एक की चर्चा आम (ई. शुभानंद मुकेश)। बाकी के लिए उम्मीद से अधिक चुनौती। दलगत प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय संतुलन, और जातीय समीकरण – तीनों ही कारक तय करेंगे कि भागलपुर का कौन-सा चेहरा मंत्री पद की चौखट पार करेगा।

भागलपुर ने एनडीए को क्लीन स्वीप देकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। अब बारी है सरकार की।क्या वह इस ऐतिहासिक प्रदर्शन का सम्मान करते हुए भागलपुर में मंत्रालय का सूखा खत्म करेगी। वैसे अश्विनी चौबे इस सुखाड़ को कुछ दिनों के लिए गिला किया था। या फिर जिले को एक बार फिर सिर्फ चुनावी वादों के भरोसे छोड़ दिया जाएगा! भागलपुर इंतजार में है।

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