गणादेश खासः कहीं श्रीलंका न बन जाए हमारा झारखंड, मुख्यमंत्री के अधीन क्लाइमेट चेंज डिपार्टमेंट डिफंक्ट, 20 फीसदी तक अनाज की कीमतों में हो सकती है वृद्धि

200 करोड़ रुपए से अधिक का अनाज बाहर से पड़ सकता है मंगाना
सूबे के 39 लाख किसान 22 साल में 15 साल खा चुके हैं धोखा
हर साल सुखाड़ का सामना करने के लिये पैकेज की मांग की जाती है, लेकिन स्थायी निदान अब तक नहीं
सिर्फ बैठकों और मंथन का ही चलता रहता है दौर, छह साल में क्लाइमेट चेंज डिपार्टमेंट में एक अफसर भी नहीं
रांचीः हमारा झारखंड कहीं श्रीलंका न बन जाए। इस बार जो स्थिति बन रही है उसे गणादेश आगाह करा रहा है। मॉनसून की बेरूखी के कारण इस साल आनाज 20 फीसदी तक महंगा हो सकता है। अनाज के लिए झारखंड को दूसरे राज्यों खासकर छत्तीसगढ़, पंजाब और बिहार पर निर्भर रहना होगा. राज्य में सामान्य स्थिति में प्रदेश में 55से 60 लाख टन अनाज का उत्पादन होता है. इस साल 35 से 40 लाख टन अनाज उत्पादन की संभावना जताई जा रही है. प्रति टन अनाज की कीमत लगभग 1000 रुपये आती है. इस हिसाब से लगभग 200 करोड़ रुपये का अनाज बाहर से मंगाना पड़ सकता है. सूबे में फसल त्रीवता भी राष्ट्रीय मानक से कम है. झारखंड में फसल त्रीवता 120 फीसदी है, जबकि राष्ट्रीय मानक 130 फीसदी है.
क्लाइमेट चेंज डिपारर्टमेंट भी डिफंक्ट
मुख्यमंत्री के अधीन जलवायु परिवर्तन(क्लाइमेट चेंज) विभाग फिलहाल डिफंक्ट हो गया है. बताते चलें कि क्लाइमेट चेंड डिपार्टमेंट को वन एवं पर्यावरण विभाग के साथ मर्ज किया गया था। लेकिन कागज पर डिपार्टमेंट तो बन गया लेकिन छह साल बाद भी यह फंक्शन में नहीं आ पाया। इस विभाग को देखने के लिए कोई भी अफसर नहीं है। राज्य में हो रहे जलवायु परिवर्तन को देखते हुए 3178.4 करोड़ का एक्शन प्लान तैयार किया गया था, लेकिन इस पर एक भी काम नहीं हुआ
क्या होता क्लाइमेट चेंज डिपार्टमेंट के फंक्शन होने से
क्लाइमेट चेंज डिपार्टमेंट के फंक्शन होने से जलवायु परिवर्तन के अनुसार योजनाएं तैयार की जाती। जलवायु परिवर्तन के अनुसार कृषि की योजनाओं का खाका खींचा जाता। जल प्रबंधन पर काम किया जाता। भू-गर्भ जलस्तर के दोहन को रोका जाता। साथ ही जल संचयन और जल स्त्रोतों का संरक्षण भी किया जाता। लेकिन सरकार ने विभाग का गठन तो कर लिया लेकिन बदलते जलवायु परिवर्तन के हिसाब से अब तक जल सुरक्षा, जल संरक्षण और पानी की गुणवत्ता के लिए कोई योजना नहीं बनाई. हैं.
झारखंड में सुखाड़ से भी बदतर हालात
झारखंड में सुखाड़ से भी बदतर हालात बन रहे हैं। झारखंड में सामान्य परिस्थिति में 15 जुलाई तक धान की 80 फीसदी और 31 जुलाई तक शत-प्रतिशत रोपाई हो जाती है. इस साल 28 जुलाई तक धान की रोपाई 10 फीसदी ही हो पाई है। 45 फीसदी से भी कम बारिश हुई है। दूसरी प्रमुख वजह यह है कि झारखंड में औसत वर्षा 1400 मिलीमीटर होने के बावजूद सिर्फ 20 फीसदी ही वर्षा जल का उपयोग हो पाता है. वहीं 118 लघु सिंचाई योजनाओं में सिर्फ 44 का ही काम पूरा हो पाया है. वहीं प्रदेश के आठ जिले डेंजर जोन में हैं. पलामू, धनबाद, रांची, पूर्वी सिंहभूम, गोड्डा, रामगढ़, बोकारो, लोहरदगा में भू-गर्भ जल का दोहन 100 से 70 फीसदी हो चुका है. 70 फीसदी से कम भू-गर्भ जल के दोहन वाले क्षेत्र को सुरक्षित माना गया है.
सुखाड़ घोषित करने के क्या हैं मानक
15 जून से 30 सितंबर तक 75 फीसदी से कम बारिश
फसल बुआई 50 फीसदी से होनी चाहिये कम
नॉर्मल डिफरेंशियल वेजिटेशन(एनडीवीआई) 0.4 फीसदी से होना चाहिये कम
आद्रता 0.4 फीसदी से होना चाहिये कम
फैक्ट फाइल
ढ़ाई से तीन लाख हेक्टेयर : सब्जी की खेती
एक से डेढ़ लाख हेक्टेयर : फलों की खेती
20 हजार हेक्टेयर : काजू की खेती
1000 हेक्टेयर : संतरा की खेती
4000 हेक्टेयर : फूलों की खेती
26 हजार हेक्टेयर : आर्गेनिक फार्मिंग
झारखंड में कृषि की स्थिति : एक नजर
कुल किसान : 39 लाख
भौगोलिक क्षेत्र : 79.71 लाख हेक्टेयर
खेती योग्य जमीन- 38 लाख हेक्टेयर
खेती होती है : 25.75 लाख हेक्टेयर
दो हेक्टेयर जोत के किसान : 83 फीसदी
सालाना बारिश : लगभग 1400 मिलीमीटर
मॉनसून अवधि – चार माह( जून-सितंबर)
वर्षा जल का उपयोग : 20 फीसदी
सिंचाई सुविधा : 13 फीसदी
फसल घनत्व : 125 फीसदी

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