गणादेश खासः स्थानीयता रार, तकरार और वार के साथ एक्शन, इमोशन और ड्रामा भी
रांचीः झारखंड की राजनीति कब किस करवट बैठेगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। अब फिर एक बार स्थानीयता का जिन्न बाहर निकल गया है। इस पर रार, तकरार, वार के साथ एक्शन, इमोशन और ड्रामा भी है। विपक्ष के साथ अब सरकार के अपने भी इस मामले पर आवाज बुलंद कर रहे हैं। झामुमो के कद्दावर नेता लोबिन हेंब्रम ने तो कमर ही कस ली है। शुक्रवार को उन्होंने कह भी दिया कि खतियान आधारित स्थानीय नीति क्यों नहीं लागू हो रही। सीएम को इस पर निर्णय लेना चाहिए। मुख्यमंत्री के बयान से आहत हूं। ऐसे में मेरे विधायक रहने या नहीं रहने का कोई मतलब नहीं है।
राज्य अब युवा हो चला है पर रार जारी है
झारखंड अब युवा हो चला है। 22 साल का हो गया है। फिर भी इस मसले पर रार जारी है। आदिवासी, मूलवासी 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय निवासी की पहचान करने की मांग करते आ रहे हैं। झामुमो खुद इसकी शुरू से ही वकालत करता आ रहा है। सीएम हेमंत सोरेन ने कह दिया कि 1932 के सर्वे को आधार मानकर स्थानीय नीति बनती है तो वह न्यायालय से रद हो जाएगी। बस सीएम का य़ही चौंकाने वाला बयान भी विपक्ष के साथ अपनों को भी हवा दे गया। अब सवाल उठने लगा कि सरकार और उनकी पार्टी को पहले से था तो लंबे समय से ऐसा वादा क्यों किया जा रहा था?
झामुमो के दिग्गज भी बोल रहे खुलकर
झामुमो के कद्दावर नेता जगरनाथ महतो और लोबिन हेंब्रम अब इस पर खुलकर बोल रहे हैं। इसको लेकर सत्ता के गलियारों में चर्चा शुरू हो गई है। राजनीति के जानकारों की मानें इस मसले पर झामुमो को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
मधुमक्खी के छत्ते पर आखिर हाथ कौन डाले
यह मुद्दा मधुमक्खी के छत्ते जैसा है। इस पर कोई भी हाथ नहीं डालना चाहता। जब किसी ने इसे छूने की कोशिश की, उसे नुकसान उठाना ही पड़ा। झारखंड के पहले सीएम बाबूलाल मरांडी ने इसी आधार पर स्थानीय को पहचान करने की नीति लागू की थी। तब राज्य में भारी बवाल हुआ था। भारतीय जनता पार्टी की रघुवर दास सरकार ने वर्ष 1985 का कटआफ डेट मानकर स्थानीय व नियोजन नीति बनाई थी। उस समय इसका भी काफी विरोध हुआ था और आदिवासियों- मूलवासियों में यह फैलाया गया कि राज्य की नौकरियों पर बाहरी काबिज हो जाएंगे। हेमंत सोरेन की सरकार ने पिछले कुछ महीने में नई नियुक्ति नियमावली बनाई है, जिनमें स्थानीय लोगों को नौकरियों में आरक्षण के प्रविधान किए गए हैं। इसके खिलाफ भी कुछ लोग हाई कोर्ट चले गए हैं। न्यायालय ने राज्य सरकार को सुझाव दिया है कि स्थानीय नीति को जल्द से जल्द परिभाषित किया जाए नहीं तो राज्य में निकाली जा रही सभी भर्तियां कानूनी पचड़े में फंस जाएंगी।

