झारखंड में बदली सियासत की तस्वीर: पहले मुख्यमंत्री बदलते थे, अब मंत्रियों की कुर्सी पर अस्थिरता
रांची: अलग झारखंड राज्य के गठन के बाद शुरुआती वर्षों में सरकारों की अस्थिरता राज्य की राजनीति की पहचान बन गई थी। मुख्यमंत्री बदलते रहे और कई सरकारें अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकीं। हालांकि, वर्ष 2015 में रघुवर दास के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार ने पहली बार पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। इसके बाद से राजनीतिक अस्थिरता का स्वरूप कुछ बदला है। अब पिछले करीब दस वर्षों में मंत्रियों के स्तर पर लगातार अस्थिरता देखने को मिल रही है। खासकर शिक्षा विभाग को लेकर घटनाक्रम राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
वर्ष 2019 में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनने के बाद तत्कालीन अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हाजी हुसैन अंसारी का कोरोना संक्रमण के कारण निधन हो गया। इसके बाद शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो की तबीयत बिगड़ी और बीमारी के बाद उनका भी निधन हो गया। जगरनाथ महतो के निधन के बाद शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी लातेहार के तत्कालीन विधायक बैद्यनाथ राम को दी गई। हालांकि, उनका कार्यकाल करीब छह महीने ही रहा और विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई। चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
इसके बाद हेमंत सोरेन के नेतृत्व में दूसरी बार सरकार बनी तो शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी रामदास सोरेन को मिली। लेकिन करीब एक साल के भीतर उनका भी निधन हो गया। इसके बाद शिक्षा विभाग फिर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पास आ गया। वहीं उच्च शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी सुदिव्य कुमार सोनू संभाल रहे थे। बीते रविवार को हार्ट अटैक से उनके आकस्मिक निधन के बाद यह विभाग भी फिलहाल मुख्यमंत्री के पास है।
इस पूरे घटनाक्रम के कारण राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा विभाग संभालने वाले मंत्रियों के साथ लगातार अप्रिय घटनाएं क्यों हुईं। हालांकि, इसे महज संयोग माना जा सकता है और इसके पीछे कोई राजनीतिक या अन्य कारण बताना उचित नहीं होगा। फिर भी यह विषय झारखंड की सियासत में चर्चा का केंद्र जरूर बन गया है।
सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री किस मंत्री को सौंपेंगे। सरकार के कई मंत्रियों से बातचीत में अधिकांश ने इस जिम्मेदारी को लेकर सीधे तौर पर अपनी दावेदारी पेश करने से परहेज किया। मंत्रियों का कहना था कि यदि मुख्यमंत्री जिम्मेदारी देंगे तो उस पर विचार किया जाएगा। फिलहाल सभी दिवंगत मंत्री के निधन से दुखी हैं और इस समय विभाग को लेकर चर्चा करना उचित नहीं मानते।
वहीं झामुमो विधायक राम सूर्या मुंडा ने कहा कि यदि उन्हें शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी दी जाती है तो वह इसे स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि वह इस तरह की फालतू और मनगढ़ंत बातों में विश्वास नहीं करते। उन्होंने कहा कि वह बिरसा मुंडा के वंशज हैं और उन्हें सरना माता का आशीर्वाद प्राप्त है। साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का आशीर्वाद भी उनके साथ है। शिबू सोरेन ने उनसे कहा था कि वह चार बार मंत्री बनेंगे।
कांग्रेस विधायक दल के उपनेता राजेश कच्छप ने भी शिक्षा विभाग मिलने पर काम करने की इच्छा जताई। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें विभाग की जिम्मेदारी मिलती है तो सबसे पहले विभाग का नाम बदलकर मानव संसाधन विभाग रखेंगे। इसके बाद सर्वधर्म प्रार्थना सभा आयोजित कर विभागीय कार्य की शुरुआत करेंगे।
राजेश कच्छप ने कहा कि देश की आजादी और अलग झारखंड राज्य के आंदोलन में अनेक लोगों ने कुर्बानी दी है। वह भी झारखंड के लिए हर तरह की जिम्मेदारी और कुर्बानी निभाने के लिए तैयार हैं।
अब देखना यह होगा कि सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी अपने पास रखते हैं या मंत्रिमंडल के किसी सदस्य को यह महत्वपूर्ण विभाग सौंपते हैं।


