भगवान बिरसा मुंडा के वंशज आज भी खेतों में मजदूरी को मजबूर, सरकार की घोषणाएं रह गईं कागज़ों पर,झविमो के पूर्व जिला अध्यक्ष दिलीप मिश्रा ने शहीद आयोग का गठन करने की मांग
रांची : आदिवासी अस्मिता और स्वतंत्रता संग्राम के महानायक धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की जन्मस्थली खूंटी जिला का उलीहातू गाँव आज भी बदहाली का शिकार है। देश के प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री, मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक—सबने इस पवित्र धरती पर कदम रखे, मंच से बड़े-बड़े वादे किए, लेकिन बिरसा के वंशज आज भी दूसरों के खेतों में रोपनी मजदूरी कर जीविका चला रहे हैं।
बिरसा मुंडा के परपोते सुखराम मुंडा की पत्नी और बच्चे आज भी धान की रोपनी में मात्र 120 रुपये की दिहाड़ी पर काम करने को विवश हैं। वृद्धा पेंशन की छोटी-सी राशि ही इनके जीवन का सहारा है। विकास की तमाम सरकारी योजनाएँ गाँव और शहीद के परिवार तक पहुँचने से पहले ही कागज़ी खानापूर्ति में सिमट जाती हैं।
घोषणाएँ हुईं, अमल नहीं
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 2022 में उलीहातू आकर बिरसा परिवार को आवास देने की घोषणा की थी। आज तक एक भी घर नहीं बना।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 2016 में भूमि पूजन किया था, लेकिन निर्माण अधूरा ही रह गया।
गृह मंत्री अमित शाह ने उलीहातू से देशभर के 19 शहीद गाँवों के विकास की नींव रखी थी, पर धरातल पर बदलाव शून्य है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2023 में विकसित भारत संकल्प यात्रा के क्रम में उलीहातू पहुँचे, लेकिन हालात जस के तस हैं।
‘धरती आबा’ के नाम पर राजनीति
उलीहातू में हर साल बिरसा मुंडा की जयंती और पुण्यतिथि पर मेले लगते हैं। नेताओं का कारवां पहुँचता है, भाषण होते हैं, योजनाओं की घोषणाएँ होती हैं। पर न तो गाँव की तस्वीर बदली और न ही शहीदों के वंशजों का जीवन। आज भी गरीबी, बेरोजगारी और उपेक्षा इनके हिस्से में है।
शहीद आयोग की माँग
स्थानीय नेता और झाविमो के पूर्व जिलाध्यक्ष दिलीप मिश्रा ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि देशभर के शहीदों और उनके परिजनों के पुनर्वास के लिए “शहीद आयोग” का गठन किया जाए। उनका कहना है कि शहीदों के नाम पर केवल स्मारक और आयोजन नहीं, बल्कि उनके वंशजों को सम्मान, रोजगार और आर्थिक सुरक्षा देना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


बिरसा मुंडा के परपोते सुखराम मुंडा का घर



