शिबू सोरेन के दिशुम गुरु बनने की कहानी
रांची :झारखंड की राजनीति और आदिवासी आंदोलन में शिबू सोरेन का नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। लोग उन्हें सम्मानपूर्वक “दिशुम गुरु” कहते हैं, जिसका अर्थ है जनजातीय समाज के महान गुरु। यह उपाधि उन्हें उनके जीवनभर के संघर्ष, नेतृत्व और आदिवासी समाज के प्रति निस्वार्थ सेवा के कारण मिली।
शिबू सोरेन ने बचपन में ही पिता को जमींदारों के शोषण का शिकार होते देखा, जिससे उनके मन में आदिवासी अधिकारों की रक्षा का संकल्प जागा। 1970 के दशक में उन्होंने जल-जंगल-जमीन की रक्षा और आदिवासियों की राजनीतिक पहचान के लिए आंदोलन की शुरुआत की। इसी दौर में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की स्थापना की, जो आगे चलकर अलग झारखंड राज्य आंदोलन का नेतृत्वकर्ता बना।
उनकी अगुवाई में हजारों आदिवासी शोषण और अन्याय के खिलाफ सड़क पर उतरे। उन्होंने जनसभाओं के माध्यम से आदिवासी समाज को अपनी ताकत पहचानने और संगठित होने का संदेश दिया। उनकी आवाज कमजोर और वंचित तबके के लिए उम्मीद की किरण बनी।
1980 में शिबू सोरेन पहली बार लोकसभा पहुंचे और वहां से भी आदिवासी हितों की जोरदार पैरवी की। वर्षों के संघर्ष का परिणाम था कि 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य का गठन हुआ। राज्य गठन के बाद वे तीन बार मुख्यमंत्री बने। उनकी ईमानदारी, जुझारूपन और आदिवासी अस्मिता की लड़ाई ने उन्हें जनता के दिल में “दिशुम गुरु” बना दिया। आज भी यह नाम केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के गर्व और सम्मान का प्रतीक है। शिबू सोरेन की यह पहचान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।



