मधुश्रावणी का निस्तार के साथ हुआ समापन
गणादेश बथनाहा:
बीते दिवस मिथिला क्षेत्र में सुहागन एवं नवविवाहिता स्त्रियों द्वारा श्रावण मास में मनाया जाने वाला प्रमुख पर्व मधुश्रावणी व्रत पर्व का हुआ समापन। यह पर्व सावन माह के कृष्ण पक्ष के पंचमी से आरंभ हो कर सावन माह के शुक्ल पक्ष तृतीया तक चलने वाला पर्व है। इस पर्व में नवविवाहिता मिट्टी से बने हाथी,नाग नागिन और गौरी माता सहित अस्सी हजार देवी देवताओं की पूजा करती है। सावन कृष्ण पंचमी को पूजा का आरंभ होता है और शुक्ल तृतीया यानी मधुश्रावणी को व्रत का निस्तार होता है। इन दिनों नव विवाहिता नमक का सेवन नहीं करती। प्रातः एवं संध्या पूर्व विविध पुष्प चुगती है। पूजा स्थली पुष्प से आच्छादित रहता है। सुबह शाम लौकिक प्रचलन के अनुसार पूजन और मैथिल गीत नाद से गांव का माहौल उत्सव सा रहता है। ग्रामीण कथा कहने वाली पर्व से संबंधित कथा कहती है।संस्कृत मंत्र के स्थान पर मैथिल फकड़ा से पूजन इसकी विशेषता है। किसी प्रकांड विद्वान पंडित की आवश्यकता नहीं पड़ती जो मैथिल प्रचलित रीति है उसी से पूजन कर्म होता है। केवल महिलाएं ही इस कार्यक्रम में शामिल होती है और पर्व को संपन्न कराती है। प्रचलित फकडा ” दीप दिपहरा जागू बाढ़े, हीरा मोती घड़ा भरे नाग बाढ़े नागीन बाढे ,नाग के परिवार बाढे बासुकी राज बाप बाढ़े बासुकैन माई बाढ़े फौना मौना मामा बाढ़े, ककर प्रसादे खाय खीर, पहिरी चीर…. आस्तिक मुनि,आस्तिक मुनि, आस्तिक मुनि। इन्ही प्रचलित विधान से ग्रामीण महिला पूजा संपन्न कराती है।ब्राह्मण भोज के बदले अहिवाती महिला अर्थात सुहागन महिला को भोज का निमंत्रण देकर भोजन कराया जाता है। जितना सुन्दर मैथिली भाषा है, मैथिल संस्कार है उतना ही सुन्दर प्रचलित मैथिल रीति रिवाज और पर्व है।

