सुल्तान पोखर की कहानी हैरत में डालने वाली
रूपेश कुमार मिश्र
गणादेश बथनाहा:अररिया जिला का फारबिसगंज प्रखंड अपने में कई इतिहास समेटे हुए है। इन्हीं ऐतिहासिक गाथाओं को बयां करता एक विशाल जलाशय है। जो न केवल फारबिसगंज की पहचान है, अपितु सांप्रदायिक सद्भाव का केंद्र भी है जिसे सुलतान पोखर के नाम से जाना जाता है।
यह पोखर मुस्लिम जागीरदार की क्रूरता और हिन्दू महिला के सतीत्व रक्षार्थ उठाए गए कदमों को बयां करते हुए आज भी विद्यमान है। इस विशाल जलाशय के दक्षिणी भाग में स्थित है सुल्तानी माई मंदिर और मजार। इसके उत्तरी महाड़ ( घाट) पर स्थित है एक अंग्रेज अधिकारी अलेक्जेंडर हेनरी फोर्ब्स की लाल कोठी, जहां चलती थी कचहरी । साथ ही फॉर्ब्स के दीवान यहां रहते थे। फोर्ब्स साहब जिसे अंग्रेजी के नवसिखुवे फोरबेस साहब भी कहकर बुलाते थे। उन्हीं के नाम पर इस शहर का नाम फारबिसगंज पड़ा। लाल कोठी सटे ही फारबिसगंज के पूर्व भाजपा विधायक मायानंद ठाकुर और प्रसिद्ध लक्ष्मी प्रेस के मालिक का आवास भी है। इसके पूर्वी घाट पर भूमि निबंधन कार्यालय और संचेती भवन भी है।
कभी सुल्तान पोखर एक विशाल जलाशय हुआ करता था किन्तु सरकारी उदासीनता, गाद, कूड़ा करकट और लगातार भूमि अतिक्रमण से यह झील सा अथाह पोखर का जल क्षेत्र सिमट कर रह गया है। प्रभावशाली लोगों के अतिक्रमण के कारण सरकार, प्रशासन और समाज भी इसे संरक्षण देने के बदले मौन है। फलस्वरूप इसका केवल उत्तरी महाड़ ही बचा है। बांकी सभी ओर ऊंची ऊंची बिल्डिंग। पहले तो मीडिया ने भी इसके ऐतिहासिक पहलू को उठाया किन्तु अब सब चुप चुप चुप….। इसी कारण से भंसिया पोखर, सीताधार, डोमबांध, ऐतिहासिक फारबिसगंज मेला और सुल्तान पोखर सब अतिक्रमण का शिकार हो अपने अस्तित्व से ही लड़ रहे है।
सुल्तानपुर के जागीरदार सुल्तान नामक शासक और फारबिसगंज शहर से पांच किमी दूर स्थित सहवाजपुर ग्राम की एक ब्राह्मण लडकी से जुड़ी हुई है इस पोखर की कहानी। सहवाजपुर पंचायत के भद्रेश्वर ग्राम निवासी वयोवृद्ध नरेश मिश्र का कहना है कि लोकगाथा के अनुसार आजादी से पूर्वकाल में सुल्तानपुर पूरब में वर्तमान अररिया प्रखंड के मदनपुर स्टेट और पश्चिम में फारबिसगंज प्रखंड के भद्रेश्वर स्टेट उत्तर में नेपाल और दक्षिण में अररिया तक फैला हुआ था। लोकगाथा के अनुसार सुल्तान सुल्तानपुर का जागीरदार था। सुल्तान शरीर से भयानक , बलशाली, अतिकाय और क्रूर बदमाश जागीरदार था। सनकी मिजाज और अफीम का शौकीन (फारबिसगंज क्षेत्र अफीम की खेती हेतु भी मशहूर था।) सुल्तान के लिए बात बात पर कत्लेआम आम बात थी। अय्याश सुल्तान एक बार अपने सैनिकों के साथ कर वसूलते हुए सहवाजपुर ग्राम पंहुचा। घोड़ों के झुंड और जागीरदार को देखने लोग बाहर निकले तो कौतूहलवश एक ब्राह्मण की लड़की भी बाहर निकली। उस सुलक्षणा नाम की लड़की जो कि बहुत ही सुन्दर थी पर सुल्तान की नजर पड़ी। सुल्तान ने कभी इतनी सुंदर लड़की नहीं देखी थी। वह होशोहवास खो बैठा। उसने लड़की के पिता का पता लगवा संदेश भेजवाया कि उक्त दिनों से पहले यदि सुलक्षणा का विवाह सुल्तान से नहीं करवाया तो वह लड़की को जबरदस्ती ले जायेगा और पूरे समाज को भुक्तभोगी होना पड़ेगा। जागीरदार का संदेश सुन परिवार में कन्नारोहट होने लगा। कोई लड़की को कोसता तो कोई विधाता को दोष देता। लडकी नाम के अनुरुप समझदार थी। राजस्थान की जौहर गाथा उसने सुन रखी थी कि कैसे अपनी सम्मान रक्षा हेतु महिलाओं ने जीवित शरीर की आहूति अग्नि में दी थी। उसने परिवार को ढांढस बंधाई और बोली मुझे जाने दो। उसने अपने मन में कुछ विचार कर संदेशवाहक से कहा कि जाओ जागीरदार से कहना कि मेरे पिता विवाह दिन की गणना कर रहे हैं। मैं उस गणना के अनुसार विवाह करुंगी। किंतु मेरी कुछ शर्तें हैं पहली कि विवाह पूर्व तक मैं मुस्लिम जनाना के बीच रहूंगी ताकि मैं मुस्लिम तौर तरीके सीख सकूं। कोई पुरुष मेरे नजदीक भी नहीं आयेगा। दुसरी शर्त विवाह तक मुझे हिन्दू धर्म के अनुसार पूजा अर्चना करने की आजादी मिले, मेरा धर्म परिवर्तन न हो। और तीसरी शर्त मेरा विवाह हिन्दू रीति से हो। हिंदू धर्म में विवाह में पोखर पूजन का विधान है। अतः सुल्तान को अपने प्रेम का सबूत पेश करना होगा। इसके लिए एक ऐसे जलाशय का निर्माण करें जो सुल्तानपुर ही नहीं आसपास के जागीर में भी नहीं हो ।और मैं विवाह से पूर्व बीच जलाशय में उसकी पूजा करुंगी। लोग उस पोखर को देखकर वर्षों तक हमारे विवाह के साक्षी बनेंगे। सुल्तान विवाह हेतु उतावला था। अतः शर्त स्वीकार कर लिया।आदर के साथ लड़की सुसज्जित पालकी पर जागीरदार की महल आई। तालाब निर्माण शुरु हुआ और जल्द ही एक विशाल जलाशय खुदकर तैयार हो गया। इसी बीच समाजिक तानों को सुन उसके माता पिता एक मुस्लिम को कन्यादान के दंश से बचने हेतु अपने सगे संबंधियों के साथ नेपाल सीमा में कही दूर चले गए। शर्त के मुताबिक चूंकि मैथिल रीति रिवाज में सावन भादो अश्विन कार्तिक ये चार माह विवाह नहीं होता है, अतः अगहन मास में दिन तय हुआ था और तब तक जलाशय भी जल से लबालब भर गया था। कहा जाता है कि विवाह से पूर्व पूर्णिमा था। अतः रात्रि में मुस्लिम महिलाओं के साथ पूजा की थाल लिए सुलक्षणा तालाब के मध्य पहुंची। आसमान में मुस्कुराते चांद को देखा। तालाब की पूजा की और मौका देख तालाब में कूद गई। हर तरफ हाय तौबा मच गया। तुरंत लड़की को ढूंढने का जुगाड़ लगाया गया किन्तु लड़की को मानो तालाब ने अपने में छुपा लिया हो। सुल्तान बैचेन और पागल सा हो गया था। चौथे दिन लड़की का शव पोखर के दक्षिणी घाट पर मिला। जिसे देख सुल्तान भी डर से थरथराने लगा। एक कुंवारी ब्राह्मण लडकी ने अपने सतीत्व रक्षार्थ ऐसा कदम उठाया है, अतः वह अनजाने शाप से भयभीत हो गया था कि कहीं उसका जागीर वंश सब नष्ट न हो जाए। भयभीत सुल्तान ने चापलूस मौलवी व पंडितों से विचारविमर्श कर पहले लड़की के शव को ही सिंदूरदान देकर विवाह किया। पुनः जहां किनारे पर शव लगा था। वहीं किनारे दफनाकर एक मजार बना दिया गया। वह मजार और मंदिर दोनों साथ साथ एक ही स्थान पर है। कहते हैं अनिष्ट के डर से सुल्तान इतना भयभीत हो गया था कि उसने शव को साक्षी मानकर कसम खाई कि वह अब किसी का भी जबरन धर्मांतरण नहीं करवायेगा। और इस बात को सब याद रखे इसलिए इस पोखर को सब सुल्तान पोखर कहेंगे। बाद में सुल्तान के वंशज ने अपनी जागीर अंग्रेज अधिकारी अलेक्जेंडर हेनरी फोर्ब्स के हाथों सौंप दिया। फॉर्ब्स ने सुल्तानपुर के पूर्वी भाग का जमींदारी पट्टा मदनपुर इस्टेट को और पश्चिमी भाग का जमींदारी पट्टा भद्रेश्वर इस्टेट को दिया। बाद में जब भारत आजाद हुआ और अंग्रेज़ी शासन समाप्त हुआ तब फारबिसगंज शहर जो कि अंग्रेजों के मालकियत में था कहते हैं कि कानपुर के एक व्यवसाई जुगीलाल कमलापति के हाथों बेच दिया, जिसमें सुल्तान पोखर भी शामिल था।
आज सुल्तान पोखर भले ही सिमट गया हो किन्तु इतिहास का साक्षी बन मौजूद है। आज भी हिन्दू मुस्लिम सुल्तानी माई के मंदिर और मजार में एक साथ पूजा और इबादत करते हैं। प्रत्येक वर्ष वार्षिक उर्स का मेला लगता है और चादरपोसी होती है । मान्यता है कि सुल्तान पोखर में स्नान कर जो भी निसंतान महिला सुल्तानी माई से संतान सुख की प्रार्थना करती है उसे संतान अवश्य प्राप्ति होती है। मिथलांचल के प्रसिद्ध सिरुवा पर्व में संतान अभिप्सु महिलाओं द्वारा स्नान की प्रथा आज भी है। यहां प्रत्येक वर्ष भव्य छठ पर्व का आयोजन होता है। किन्तु सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक यह पोखर आज उपेक्षित है।

