राहुल गांधी की न्याय यात्रा आदिवासियों को अस्थिर करने की साजिश: सुबोध पूर्ति
खूंटी: झारखंड आंदोलनकारी सुबोध पूर्ति ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि राहुल गांधी की न्याय यात्रा आदिवासियों के लिए यह अन्याय यात्रा है। आदिवासियों को इस यात्रा से दूर एवं सावधान रहने की जरूरत है। उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि राहुल गांधी के पूर्वज,देश के तत्कालीन प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने हमारे आदिवासी समाज के जननायक मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा को धोखे में रखकर मजबूत एवं शक्तिशाली झारखंड पार्टी को कांग्रेस में विलय कराया था। राहुल गांधी का इस न्याय यात्रा से आदिवासियों को कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है बल्कि हमारे कीमती वोटों पर डाका डालने काम किया जाएगा और अपने समाज के लिए घातक साबित होगा। कांग्रेस की यह पुरानी राजनीतिक पोलिसी रही है कि आदिवासियों खासकर ईसाई मतदाताओं को भाजपा का भय दिखाकर उनका वोट लेना। भोले- भाले आदिवासी कांग्रेस पार्टी की इस चतुराई भरी राजनीतिक चाल को भांप नहीं पाते और कांग्रेस का आसान शिकार बनकर धोखा खा जाते हैं।आज आदिवासी समाज में भयंकर राजनीतिक अस्थिरता व्याप्त है, इसके लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां जिम्मेवार हैं बल्कि कांग्रेस ज्यादा खतरनाक हैं फर्क सिर्फ इतना है कि भाजपा सामने से मारती है और कांग्रेस पीछे से, सामने से मारने वाले से आपको बचने का सम्भावना है लेकिन पीछे से हमला करने वाले से आपको बचना कठिन है इसलिए कांग्रेस ज्यादा खतरनाक हैं। इन्सान लुटाता है जब लूटेरों पर भरोसा करता है। इसलिए जबतक आदिवासी समाज राजनीतिक, रणनीतिक और कूटनीतिक तौर पर अदृश्य पहलुओं को नहीं समझेंगे तब तक हमारी जल जंगल जमीन और पूर्वजों के कुर्बानी के बदौलत मिले संवैधानिक अधिकार भी लुटाते रहेंगे।
आदिवासियों के राजनीतिक दुर्दशा के लिए तथाकथित स्वयंभू आदिवासी नेता भी कम जिम्मेदार नहीं हैं जो अपने आप को विस्थापन विरोधी आंदोलन के नेता मानते हैं,जल जंगल जमीन बचाने की बात करते हैं, आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की वकालत करते हैं और कांग्रेस, भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों की दलाली एवं दरबार में चाकरी करते हैं। आज आदिवासी समाज को ऐसे दलालों से सावधान रहने की जरूरत है ऐसे नेता आपका आन्दोलन की अगुवाई नहीं करते बल्कि आदिवासीयत के मुद्दों के आड़ में अपना धंधा चलाते हैं।
मैं तमाम आदिवासी भाई बहनों, पारंम्परिक समाजिक अगुवों, बुद्धिजीवियों से आह्वान करता हूं कि आदिवासियों के वर्तमान जर्जर राजनीतिक हालात पर आत्म मंथन करते हुए सामुहिक एवं सामुदायिक क्षेत्रीय राजनीतिक दिशा तय किया जाए ताकि आदिवासियों के संवैधानिक अधिकार, अस्तित्व, अस्मिता, पहचान, भाषा -संस्कृति एवं जल जंगल जमीन की रक्षा करते हुए आदिवासियों के महानायक क्रांति वीर शहीद बिरसा मुंडा, शहीद सरदार गया मुंडा, जननायक मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा, झारखंड गोमके निरल एनेम होरो के सपनों का झारखंड “अबुआ दिशुम रे अबुआ राइज” “अंबुजा हातु रे अबुआ राइज” स्थापित किया जा सके।

