न कोई मशीन और न ही बड़ी बड़ी इमारतें,कच्चे मकानों में हाथों से निर्मित हो रहा है कांसे का वर्तन
खूंटी : थाली, जी हां थाली का इस्तेमाल भोजन ग्रहण करने,भगवान की आरती लगाने और प्रसाद का वितरण में होता है। थाली यदि कांसे की हो तो वह शुद्ध माना जाता है। कांसे की थाली या वर्तन बहुत ही महंगा आने लगा है।

अब भोजन की थाली स्टील,फाइबर,चीनी मिट्टी से निर्मित बर्तनों का इस्तेमाल होने लगा है। वहीं कांसे की थाली या वर्तन का उपयोग पूजा पाठ व धार्मिक कार्यों तक ही सीमित रह गया है।
अब में बात करता हूं कांसे की थाली या वर्तन के निर्माण की। खूंटी के जरिया गांव में 25-30 परिवार के लोग पिछले कई वर्षों से घर पर बगैर कोई मशीन के हाथों से ही कांसे की वर्तन और थाली का निर्माण कर रहे हैं।

पिछले तीन दशकों से पारस साहू का परिवार कांसा वर्तन के निर्माण में लगा हुआ है। रात के दो बजे से काम शुरू करते हैं और दिन के करीब बारह बजे समाप्त करते हैं। पारस साहू का कहना है की साल में दो महीने ही इसका काम होता है। कांसा का वर्तन मंहगा होने के कारण बहुत कम लोग इस्तेमाल करते हैं। कांसा वर्तन का उपयोग ज्यादातर शादी ब्याह में होता है। उनका मानना है की इसके निर्माण में बहुत अधिक मेहनत और आमदनी कम है। भट्टी जलाने के लिए कोयला का इस्तेमाल करते हैं और कोयला अब महंगा हो गया है। उनका मानना है की एक थाली को तैयार करने में पांच कर्मी लगते हैं। चार लोग पीटने वाले और एक व्यक्ति घूमने वाला होता है। ये लोग एक बार में करीब 15 वर्तन का निर्माण कर लेते हैं। इनलोगों का काम रात में ही होता है,क्योंकि रात में ही इसकी चमक दिखती है। तांबा और मिश्रित धातु से कांसा वर्तन का निर्माण होता है।
वर्तन कारीगर का कहना है कि इस गांव में बहुत पहले उद्योग मंत्री आए थे।सहायता देने का भी आश्वासन दिया था।लेकिन आजतक उसके बाद कोई नहीं आया। यहां तक की हमलोग जाति के कंसारी हैं। लेकिन जाति प्रमाण पत्र भी हम लोगों का नहीं बन रहा है। यदि हमलोगों को सरकार सहायता करे तो यह जरिया गांव औधोगिक क्षेत्र के रूप में विकसित हो सकता है। लाखों युवाओं को इसमें रोजगार मिल सकता है। यहां का निर्मित वर्तन दिल्ली,मुंबई,कोलकाता,पटना और रांची भेजा जाता है।

